सुप्रीम कोर्ट ने ग्रेटर नोएडा के एक मजिस्ट्रेट को कड़ी फटकार लगाते हुए पूछा कि अदालत के आदेश के बावजूद छात्र को नोटिस जारी करने की हिम्मत कैसे हुई। मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने मजिस्ट्रेट की इस कार्रवाई को न्यायपालिका के आदेश की घोर अवहेलना करार दिया और इसे बेहद गंभीर मामला बताया। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब शीर्ष अदालत ने किसी भी दंडात्मक कार्रवाई पर रोक लगा रखी है, तो निचली अदालत या अधिकारी द्वारा ऐसा नोटिस जारी करना सीधे-सीधे अदालत की अवमानना के दायरे में आता है। मामला ग्रेटर नोएडा के एक छात्र से जुड़ा है जिसे सीजेपी विरोध प्रदर्शन अथवा नीट-यूजी प्रदर्शनों के संबंध में मजिस्ट्रेट ने नोटिस जारी किया था। छात्र ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर इस नोटिस को चुनौती दी थी और बताया था कि शीर्ष अदालत ने पूर्व में ही छात्रों के खिलाफ किसी भी तरह की दंडात्मक कार्रवाई न करने का आदेश पारित किया था। इसके बावजूद ग्रेटर नोएडा के अधिकारी ने नोटिस जारी कर दिया, जिसे छात्र ने अदालत की अवमानना बताते हुए तत्काल रद्द करने की मांग की। सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने बेहद तल्ख लहजे में कहा, "एक मजिस्ट्रेट की यह हिम्मत कैसे हुई कि हमारे आदेश के बावजूद वह छात्र को नोटिस जारी करे?" पीठ ने इस रवैये को न्यायिक अनुशासन के विपरीत बताते हुए चेतावनी दी कि ऐसा आचरण बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। अदालत ने कहा कि संवैधानिक व्यवस्था में निचली अदालतों और अधिकारियों का कर्तव्य है कि वे उच्च न्यायालयों के आदेशों का अक्षरशः पालन करें। किसी भी प्रकार की कोताही या जानबूझकर की गई अवहेलना न्यायपालिका की विश्वसनीयता को कमजोर करती है। इस प्रकरण की पृष्ठभूमि में छात्र आंदोलनों को लेकर दर्ज मामले और उन पर अदालत द्वारा लगाई गई रोक शामिल है। सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व में स्पष्ट आदेश दिया था कि विरोध प्रदर्शन में भाग लेने वाले छात्रों के खिलाफ कोई कठोर कदम न उठाया जाए। इसके बावजूद स्थानीय स्तर पर नोटिस जारी होने से यह सवाल उठ खड़ा हुआ है कि क्या जमीनी स्तर पर अदालती आदेशों की जानकारी और अनुपालन सुनिश्चित किया जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट की इस सख्त टिप्पणी से निचली न्यायपालिका और प्रशासनिक अधिकारियों को स्पष्ट संदेश गया है कि शीर्ष अदालत के आदेशों की अवहेलना किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं होगी। अदालत ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए संबंधित मजिस्ट्रेट से स्पष्टीकरण मांगा है और मामले को आगे की सुनवाई के लिए सूचीबद्ध कर दिया है। यह निर्णय कानून के शासन और न्यायिक पदानुक्रम के सम्मान को बनाए रखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।