दक्षिणी दिल्ली के सत्य निकेतन इलाके में हुए भवन ढहने के हादसे ने एक बार फिर शहरी सुरक्षा और नागरिक प्रशासन की पोल खोल दी है। इस त्रासदी में जहां कई छात्रों की जान चली गई, वहीं अब मरने वालों की आधिकारिक संख्या को लेकर गंभीर विवाद खड़ा हो गया है। पीड़ित छात्रों और स्थानीय निवासियों का आरोप है कि प्रशासन मौत के वास्तविक आंकड़ों को छिपा रहा है और मरने वालों की संख्या कम बताई जा रही है। इस अविश्वास के माहौल में दर्जनों छात्र डर के मारे इलाका छोड़कर अपने घरों को लौट गए हैं, जिससे यह छात्र बाहुल्य क्षेत्र फिलहाल वीरान नजर आ रहा है। हादसे के बाद प्रशासन ने त्वरित कार्रवाई करते हुए अवैध निर्माण और असुरक्षित भवनों के खिलाफ तोड़फोड़ अभियान शुरू कर दिया है। इसी कड़ी में उस पेइंग गेस्ट (पीजी) के संचालक को गिरफ्तार कर लिया गया है, जिसकी इमारत ढही थी। पुलिस का कहना है कि संचालक ने बगैर अनुमति निर्माण कराया था और सुरक्षा मानकों की घोर अनदेखी की गई थी। वहीं, दिल्ली उच्च न्यायालय ने इस घटना का संज्ञान लेते हुए एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए दिल्ली सरकार और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग को नोटिस जारी किया है। याचिका में मांग की गई है कि दिल्ली विश्वविद्यालय के सभी छात्रों के लिए सुरक्षित छात्रावास सुविधा अनिवार्य की जाए, ताकि उन्हें असुरक्षित निजी पीजी में रहने को मजबूर न होना पड़े। यह हादसा अकेली घटना नहीं है, बल्कि पिछले तीन महीनों में दिल्ली में इस तरह की दूसरी बड़ी त्रासदी है। इससे पहले मुखर्जी नगर में भी एक कोचिंग सेंटर की इमारत में आग लगी थी। इन घटनाओं ने 'दिल्ली में सब चलता है' वाली मानसिकता और नगर निगम, दमकल विभाग व पुलिस के बीच समन्वय की कमी को उजागर कर दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि बिल्डिंग बायलॉज का खुला उल्लंघन, भ्रष्टाचार की वजह से अवैध निर्माण को मिली शह और पुरानी इमारतों के स्ट्रक्चरल ऑडिट की व्यवस्था न होना इन हादसों के मूल कारण हैं। छात्र संगठन अब सड़कों पर उतरकर न सिर्फ न्याय की मांग कर रहे हैं, बल्कि सभी पीजी और हॉस्टल का अनिवार्य सुरक्षा ऑडिट कराने की मांग कर रहे हैं। इस पूरे प्रकरण ने राजधानी में लाखों की संख्या में बाहर से आकर पढ़ने वाले छात्रों की असुरक्षा को रेखांकित कर दिया है। सस्ते आवास की मजबूरी में वे जान जोखिम में डालकर जीर्ण-शीर्ण इमारतों में रहने को विवश हैं। प्रशासन के लिए यह एक चेतावनी है कि केवल घटना के बाद लीपापोती करने के बजाय, एक दीर्घकालिक और पारदर्शी नीति बनाई जाए। जिसमें किफायती छात्रावासों का निर्माण, मौजूदा पीजी का सख्त नियमन और नियमित सुरक्षा जांच शामिल हो। जब तक प्रशासनिक जवाबदेही तय नहीं होगी और भ्रष्ट तंत्र पर लगाम नहीं लगेगी, तब तक सत्य निकेतन जैसे हादसों की पुनरावृत्ति को रोक पाना असंभव रहेगा।