पेरिस के प्रतिष्ठित एफिल टावर पर पिछले दिनों उस समय विवाद खड़ा हो गया जब गुजरात स्थित हिंदू धार्मिक संस्था बीएपीएस (बोचासनवासी अक्षर पुरुषोत्तम स्वामीनारायण संस्था) के एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल की यात्रा के दौरान महिला कर्मचारियों को कथित तौर पर ड्यूटी से हटाकर पुरुष कर्मचारियों को तैनात किया गया। यह मामला तब प्रकाश में आया जब एफिल टावर की महिला कर्मचारियों ने इसके विरोध में हड़ताल कर दी और फ्रांसीसी प्रशासन ने जांच के आदेश दिए। बीएपीएस विश्वभर में अपने भव्य मंदिरों और सामाजिक कार्यों के लिए जानी जाती है, लेकिन इस घटना ने संस्था की लैंगिक अलगाव की परंपराओं को अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में ला दिया है। विवाद की जड़ में बीएपीएस की वह परंपरा है जिसमें साधुओं और वरिष्ठ पदाधिकारियों के समक्ष महिलाओं की उपस्थिति को सीमित किया जाता है। रिपोर्टों के अनुसार, संस्था की ओर से फ्रांसीसी अधिकारियों से अनुरोध किया गया था कि यात्रा के दौरान महिला गाइड और सुरक्षाकर्मियों को प्रतिनिधिमंडल के निकट न तैनात किया जाए। एफिल टावर प्रबंधन द्वारा इस मांग को मान लेने से महिला कर्मचारियों में रोष फैल गया। उन्होंने इसे लिंग आधारित भेदभाव और फ्रांस के धर्मनिरपेक्ष कानूनों का उल्लंघन बताते हुए काम रोक दिया। बीबीसी और अल जज़ीरा जैसे अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों ने इस घटना को प्रमुखता से कवर किया है। फ्रांसीसी श्रम संघों और महिला अधिकार संगठनों ने इसे 'प्रतिगामी सोच' करार देते हुए कड़ी निंदा की है। सीजेपी संस्थापक अभिजीत दीपके ने कहा कि 'प्रतिगामी पुरुषों' को धर्म का संरक्षक नहीं बनने देना चाहिए। वहीं, भारत सरकार ने इस पूरे प्रकरण को संस्था और फ्रांसीसी अधिकारियों के बीच का मामला बताते हुए सीधी टिप्पणी से परहेज किया। एनडीटीवी के अनुसार, विदेश मंत्रालय ने इसे 'उनके बीच का मामला' कहकर पल्ला झाड़ लिया। हालांकि, द वायर की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि यह संस्था प्रधानमंत्री मोदी के करीबी मानी जाती है, जिससे मामले ने राजनीतिक रंग भी ले लिया है। एफिल टावर प्रबंधन ने अब आंतरिक जांच शुरू कर दी है कि किन परिस्थितियों में कर्मचारियों की तैनाती में फेरबदल किया गया। फ्रांस के सख्त धर्मनिरपेक्षता (लाइसीटे) कानूनों के तहत सार्वजनिक स्थलों पर धार्मिक मान्यताओं के आधार पर भेदभाव प्रतिबंधित है। इस घटना ने एक बार फिर बहस छेड़ दी है कि क्या सार्वजनिक स्थलों पर धार्मिक समूहों की विशेष मांगों को मानना उचित है, खासकर जब वे लैंगिक समानता के मूल सिद्धांतों के विरुद्ध हों। निष्कर्षतः, एफिल टावर पर हुआ यह विवाद केवल एक यात्रा प्रबंधन की चूक नहीं, बल्कि धार्मिक परंपराओं और आधुनिक लोकतांत्रिक मूल्यों के टकराव का प्रतीक है। बीएपीएस जैसी वैश्विक संस्थाओं से अपेक्षा की जाती है कि वे अपनी आंतरिक मान्यताओं का पालन करते हुए सार्वजनिक स्थानों पर संविधान सम्मत समानता का सम्मान करें। फ्रांस की जांच और महिला कर्मचारियों का प्रतिरोध इस बात का संकेत है कि लैंगिक भेदभाव के किसी भी रूप को अब चुपचाप स्वीकार नहीं किया जाएगा, चाहे वह किसी भी धार्मिक या सांस्कृतिक आवरण में प्रस्तुत हो।