पेरिस स्थित विश्व प्रसिद्ध एफिल टॉवर पर एक धार्मिक प्रतिनिधिमंडल के दौरे के दौरान महिला कर्मचारियों को कथित तौर पर 'अदृश्य' होने या खुद को छिपाने का आदेश दिए जाने का मामला तूल पकड़ता जा रहा है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, स्वामीनारायण संप्रदाय से जुड़े बीएपीएस संगठन के एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल की यात्रा के दौरान टॉवर प्रबंधन ने महिला स्टाफ को पुरुष कर्मचारियों से बदल दिया गया या उन्हें सार्वजनिक क्षेत्रों से दूर रहने को कहा गया। इस घटना ने फ्रांस और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लैंगिक भेदभाव और धार्मिक कट्टरता को लेकर तीखी बहस छेड़ दी है। बीबीसी और टेलीग्राफ इंडिया की रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह घटना पिछले सप्ताह की है जब बीएपीएस के वरिष्ठ पदाधिकारियों का दल एफिल टॉवर के भ्रमण पर आया था। आरोप है कि इस धार्मिक समूह की कुछ मान्यताओं के अनुरूप महिला कर्मचारियों को फ्रंटलाइन ड्यूटी से हटाकर पृष्ठभूमि में रखा गया। कुछ महिला कर्मचारियों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि उन्हें स्पष्ट निर्देश दिए गए थे कि वीआईपी दौरे के दौरान वे मेहमानों की नजर में न आएं। फ्रांसीसी श्रम संघों ने इसे महिलाओं के संवैधानिक अधिकारों का घोर उल्लंघन बताते हुए जांच की मांग की है। विवाद बढ़ने पर बीएपीएस संगठन ने स्पष्टीकरण जारी करते हुए कहा कि उनकी ओर से ऐसी कोई मांग नहीं की गई थी और यह एफिल टॉवर प्रबंधन का आंतरिक निर्णय हो सकता है। संगठन के प्रवक्ता ने जोर देकर कहा कि स्वामीनारायण संप्रदाय महिलाओं का सम्मान करता है और उनकी प्रगति में विश्वास रखता है। हालांकि, आलोचकों का कहना है कि इस तरह की घटनाएं धार्मिक संस्थाओं की पितृसत्तात्मक मानसिकता को उजागर करती हैं। सामाजिक कार्यकर्ता अभिजीत दीपके ने इसे 'प्रतिगामी सोच' करार देते हुए चेतावनी दी कि ऐसे तत्वों को धर्म का संरक्षक नहीं बनने देना चाहिए। फ्रांसीसी अधिकारियों ने मामले की आधिकारिक जांच शुरू कर दी है। पेरिस अभियोजक कार्यालय ने भेदभाव विरोधी कानूनों के तहत जांच के आदेश दिए हैं। एफिल टॉवर संचालन कंपनी SETE ने घटना को 'अस्वीकार्य' बताते हुए दोषियों पर कार्रवाई का आश्वासन दिया है। फिलहाल टॉवर को कुछ घंटों के लिए बंद रखने के बाद फिर से पर्यटकों के लिए खोल दिया गया है, लेकिन इस प्रकरण ने फ्रांस के धर्मनिरपेक्ष मूल्यों और कार्यस्थल पर लैंगिक समानता के सिद्धांतों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस पूरे प्रकरण ने एक बार फिर सार्वजनिक संस्थानों में धार्मिक दबाव के आगे झुकने के खतरों को रेखांकित किया है। जहां एक ओर धार्मिक स्वतंत्रता का सम्मान जरूरी है, वहीं संवैधानिक मूल्यों और लैंगिक न्याय से समझौता किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं हो सकता। एफिल टॉवर जैसा वैश्विक प्रतीक जब ऐसे विवादों का केंद्र बनता है, तो यह पूरी दुनिया को संदेश देता है कि प्रगतिशील समाजों को निरंतर सतर्क रहना होगा। इस मामले का नतीजा न केवल फ्रांस बल्कि दुनिया भर में धर्म, राज्य और लैंगिक समानता के रिश्तों को परिभाषित करने में महत्वपूर्ण साबित होगा।