रूस ने अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ त्रिपक्षीय शिखर बैठक की संभावना को खारिज नहीं किया है। रूसी समाचार एजेंसियों के हवाले से आई खबरों के अनुसार, मॉस्को ने इस तरह की उच्चस्तरीय वार्ता के लिए अपने दरवाजे खुले रखे हैं। यह बयान ऐसे समय में आया है जब वैश्विक भू-राजनीति में बड़े बदलाव के संकेत मिल रहे हैं और तीनों महाशक्तियों के बीच संबंधों की नई रूपरेखा तैयार होने की उम्मीद जताई जा रही है। रूसी उपविदेश मंत्री ने भी इस संभावना पर सकारात्मक संकेत दिए हैं, जिससे अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक हलकों में हलचल मची हुई है। इस बैठक के लिए एशिया-प्रशांत आर्थिक सहयोग (एपेक) शिखर सम्मेलन को संभावित मंच माना जा रहा है, जिसका आयोजन चीन में होना है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, इसी सम्मेलन से इतर राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और डोनाल्ड ट्रम्प के बीच द्विपक्षीय मुलाकात की भी अटकलें तेज हैं। यदि यह त्रिपक्षीय बैठक होती है, तो यह हाल के वर्षों में विश्व की तीन सबसे बड़ी सैन्य और आर्थिक शक्तियों के प्रमुखों की पहली ऐसी औपचारिक वार्ता होगी। जानकारों का मानना है कि यूक्रेन संघर्ष, ताइवान मुद्दा, व्यापार असंतुलन और परमाणु निरस्त्रीकरण जैसे जटिल मसलों पर सीधी बातचीत से तनाव कम करने का रास्ता निकल सकता है। रूसी उपविदेश मंत्री सर्गेई रयाबकोव ने स्पष्ट किया है कि मॉस्को रचनात्मक बातचीत के लिए तैयार है, बशर्ते सभी पक्ष एक-दूसरे की मूल सुरक्षा चिंताओं का सम्मान करें। उन्होंने कहा कि ऐसी बैठक का एजेंडा बहुत व्यापक होगा और इसमें वैश्विक स्थिरता के साथ-साथ द्विपक्षीय विवादों के निपटारे पर भी चर्चा होगी। उधर, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भी एपेक मंच का उपयोग बहुपक्षवाद को बढ़ावा देने और अमेरिका के साथ तनाव कम करने के लिए करना चाहते हैं। दक्षिण चीन मॉर्निंग पोस्ट की एक रिपोर्ट में भी इस बात पर जोर दिया गया है कि बीजिंग इस त्रिपक्षीय पहल को लेकर गंभीर है। हालांकि, इस बैठक के वास्तविक रूप लेने में कई बाधाएं भी हैं। अमेरिका की आंतरिक राजनीति, ट्रम्प प्रशासन की 'अमेरिका फर्स्ट' नीति, और रूस-चीन की बढ़ती नजदीकी से पैदा होने वाला अमेरिकी संदेह प्रमुख कारक हैं। इसके अलावा, नाटो विस्तार, प्रशांत क्षेत्र में सैन्य गठबंधन और प्रौद्योगिकी प्रतिबंध जैसे मुद्दों पर गहरे मतभेद बने हुए हैं। फिर भी, कूटनीतिक विशेषज्ञों का एक वर्ग मानता है कि संवाद की प्रक्रिया शुरू होना ही अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि होगी, भले ही तत्काल कोई ठोस समझौता न हो सके। निष्कर्ष के तौर पर कहा जा सकता है कि रूस, अमेरिका और चीन के नेताओं की संभावित त्रिपक्षीय बैठक 21वीं सदी की वैश्विक व्यवस्था की दिशा तय करने में निर्णायक साबित हो सकती है। यह पहल दर्शाती है कि तमाम मतभेदों के बावजूद बड़ी शक्तियां टकराव के बजाय संवाद का रास्ता तलाश रही हैं। आने वाले हफ्तों में एपेक शिखर सम्मेलन की तैयारियों और तीनों देशों के राजनयिक बयानों पर पूरी दुनिया की निगाहें टिकी रहेंगी, क्योंकि इस बैठक का परिणाम न केवल तीनों देशों बल्कि संपूर्ण अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के भविष्य को प्रभावित करेगा।