दिल्ली के प्रतिष्ठित श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स (एसआरसीसी) में छात्रों को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बार फिर 'दिमागी नक्सल' जैसी विवादास्पद टिप्पणी को दोहराकर राजनीतिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी है। अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने नई पीढ़ी की भाषा का प्रयोग करते हुए आलोचकों को 'नाराज फूफा', 'ओजी' (ओरिजिनल गैंगस्टर) और 'धुरंधर' जैसे विशेषणों से संबोधित किया। उन्होंने कहा कि विपक्ष की सोच पुरानी पड़ चुकी है और वे उन सपनों को पूरा करने में बाधा बन रहे हैं जो पिछली पीढ़ियां देख भी नहीं सकी थीं। इस भाषण को जहां सत्ताधारी दल युवाओं से जुड़ने की एक आधुनिक कोशिश बता रहा है, वहीं विपक्ष और नागरिक समाज के संगठनों ने इसे संवैधानिक पद की गरिमा के विपरीत बताते हुए कड़ी आपत्ति दर्ज कराई है। प्रधानमंत्री के इस बयान पर सबसे तीखी प्रतिक्रिया नागरिक अधिकार संगठन 'सिटीजन्स फॉर जस्टिस एंड पीस' (सीजेपी) की ओर से आई है। संगठन ने एक बयान जारी कर प्रधानमंत्री की आलोचना करते हुए कहा है कि देश के सर्वोच्च कार्यकारी पद पर आसीन व्यक्ति को छात्रों के सामने 'बेवकूफी भरे लेबल' चस्पा करने के बजाय उन्हें आशा, दृष्टि और रचनात्मक मार्गदर्शन देना चाहिए। सीजेपी ने आरोप लगाया कि 'दिमागी नक्सल' जैसे शब्द का प्रयोग असहमति की आवाज को कुचलने और बौद्धिक विमर्श को अपराध की श्रेणी में डालने का एक सुनियोजित प्रयास है। संगठन ने जोर देकर कहा कि लोकतंत्र में आलोचना और विरोध का अधिकार संविधान प्रदत्त है, जिसे 'नक्सल' या 'राष्ट्रविरोधी' जैसे लेबल लगाकर खारिज नहीं किया जा सकता। इस पूरे प्रकरण को लेकर मीडिया जगत और राजनीतिक विश्लेषकों में भी मतभेद स्पष्ट दिखाई दे रहे हैं। जहां कुछ मीडिया संस्थानों ने प्रधानमंत्री के भाषण को युवाओं के साथ तालमेल बिठाने वाला एक 'स्मार्ट पॉलिटिकल मूव' करार दिया है, वहीं अन्य ने इसे संसदीय मर्यादा का उल्लंघन बताते हुए चिंता जताई है। एनडीटीवी और द टेलीग्राफ जैसे संस्थानों ने अपनी रिपोर्ट्स में रेखांकित किया है कि कैसे एक शैक्षणिक संस्थान के मंच का उपयोग राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों पर व्यक्तिगत आक्षेप लगाने के लिए किया गया। दूसरी ओर, द हिंदू की रिपोर्ट में प्रधानमंत्री द्वारा एसआरसीसी की विरासत और वहां से निकले नेतृत्व की प्रशंसा करने वाले अंश को भी प्रमुखता दी गई है, जिससे भाषण के सकारात्मक पहलू भी सामने आते हैं। जानकारों का मानना है कि चुनावी मौसम नजदीक आते ही इस तरह की बयानबाजी का सिलसिला तेज होता है, लेकिन एक प्रधानमंत्री से यह अपेक्षा की जाती है कि वह संपूर्ण राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करने वाली भाषा का प्रयोग करें। 'दिमागी नक्सल' जैसे शब्द का पहली बार प्रयोग नहीं हुआ है, लेकिन एक प्रतिष्ठित कॉलेज के दीक्षांत या संवाद कार्यक्रम में इसका दोहराया जाना संवैधानिक संस्थाओं और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर बहस को नई धार देता है। युवा पीढ़ी जो रोजगार, शिक्षा और जलवायु परिवर्तन जैसे वास्तविक मुद्दों के उत्तर ढूंढ रही है, उसे राजनीतिक शब्दजाल के बजाय ठोस नीतिगत पहल की दरकार है। निष्कर्षतः, एसआरसीसी का यह संवाद कार्यक्रम जहां एक ओर प्रधानमंत्री की युवाओं से सीधे जुड़ने की शैली को दर्शाता है, वहीं दूसरी ओर सीजेपी जैसी संस्थाओं की प्रतिक्रिया लोकतांत्रिक विमर्श में गरिमा और मर्यादा बनाए रखने की आवश्यकता को रेखांकित करती है। एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए यह अनिवार्य है कि सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही संवाद की भाषा को संयमित रखें और आरोप-प्रत्यारोप के लेबल से ऊपर उठकर राष्ट्र निर्माण के वास्तविक मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करें। युवाओं को विभाजनकारी लेबल नहीं, बल्कि समावेशी भविष्य का खाका चाहिए।