अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ जारी तनाव को बेहद हल्के में लेते हुए इसे 'छोटी बात' करार दिया है। एक साक्षात्कार के दौरान उन्होंने कहा कि यह संघर्ष उनके लिए कोई बड़ी चिंता का विषय नहीं है और वे उपराष्ट्रपति जे.डी. वेंस की इस राय से पूरी तरह सहमत हैं कि इसे 'युद्ध' की संज्ञा नहीं दी जा सकती। ट्रंप की इस टिप्पणी ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक हलकों में नई बहस छेड़ दी है, क्योंकि एक ओर वे स्थिति को सामान्य बता रहे हैं तो दूसरी ओर ईरान के महत्वपूर्ण परमाणु ठिकाने पर सैन्य कार्रवाई की धमकी भी दे रहे हैं। ट्रंप ने स्पष्ट शब्दों में चेतावनी दी है कि अमेरिका ईरान के 'पिकएक्स माउंटेन' नामक परमाणु स्थल पर 'बहुत जल्द' हमला कर सकता है। यह पहाड़ी क्षेत्र ईरान के संवेदनशील परमाणु कार्यक्रम का एक प्रमुख केंद्र माना जाता है। पूर्व राष्ट्रपति ने कहा कि यदि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को नहीं रोकता तो अमेरिका के पास सैन्य विकल्प खुले हैं और इस पहाड़ी ठिकाने को निशाना बनाया जा सकता है। उनकी इस दोहरी नीति — एक ओर संघर्ष को मामूली बताना और दूसरी ओर परमाणु हमले की धमकी देना — ने विश्व शक्तियों की चिंता बढ़ा दी है। इस बीच, ईरान ने अमेरिकी धमकियों का कड़ा जवाब देते हुए कहा है कि किसी भी हमले का मुंहतोड़ जवाब दिया जाएगा। ईरानी अधिकारियों ने संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी से अमेरिकी बयानों पर संज्ञान लेने की अपील की है। वहीं, यूरोपीय देशों और खाड़ी के सहयोगी राष्ट्रों ने संयम बरतने और कूटनीतिक रास्ते अपनाने का आग्रह किया है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भी इस मुद्दे पर आपात बैठक बुलाए जाने की संभावना जताई जा रही है। विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप के बयान आगामी अमेरिकी चुनावों को ध्यान में रखकर दिए गए हैं, जहां वे अपनी 'मजबूत नेता' की छवि पेश करना चाहते हैं। हालांकि, सैन्य विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि पिकएक्स माउंटेन पर हमला मध्य पूर्व में व्यापक युद्ध को भड़का सकता है, जिसके परिणाम वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा आपूर्ति के लिए विनाशकारी हो सकते हैं। परमाणु सुविधाओं पर हमला अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन भी माना जाता है। निष्कर्षतः, ट्रंप का यह रवैया अमेरिकी विदेश नीति में अनिश्चितता को दर्शाता है। जहां एक ओर वे संघर्ष को कमतर आंक रहे हैं, वहीं परमाणु हमले की धमकी देकर तनाव को खतरनाक स्तर तक ले जा रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए यह परीक्षा की घड़ी है कि वह कूटनीति के जरिए इस संकट को कैसे टालता है। आने वाले दिनों में ईरान की प्रतिक्रिया और अमेरिका के वास्तविक कदम ही तय करेंगे कि क्षेत्र शांति की ओर बढ़ता है या विनाशकारी युद्ध की ओर।