जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर नेपाल के मुआवजे की मांग को लेकर भारत ने स्पष्ट रुख अपनाते हुए कहा है कि यह एक साझी वैश्विक चुनौती है जिसका सामना सभी देशों को मिलकर करना होगा। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने नेपाल के मंत्री की ओर से जलवायु क्षतिपूर्ति की मांग पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि जलवायु परिवर्तन किसी एक देश की समस्या नहीं है, बल्कि यह पूरी मानवता के सामने खड़ी सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। भारत ने इस बात पर जोर दिया कि विकसित देशों को जलवायु वित्तपोषण में अग्रणी भूमिका निभानी चाहिए और अपनी ऐतिहासिक जिम्मेदारियों को स्वीकार करते हुए विकासशील देशों की सहायता करनी चाहिए। नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह अपनी पहली विदेश यात्रा पर संयुक्त राष्ट्र महासभा (यूएनजीए) पहुंचे हैं, जहां वे हाल ही में आई विनाशकारी बाढ़ से हुई तबाही और जलवायु परिवर्तन के मुद्दे को जोर-शोर से उठाएंगे। नेपाल का कहना है कि वह जलवायु परिवर्तन के लिए सबसे कम जिम्मेदार होने के बावजूद इसकी सबसे बड़ी मार झेल रहा है। हाल की बाढ़ से नेपाल को अनुमानित पांच अरब डॉलर का नुकसान हुआ है, जबकि विश्व के जलवायु कोष में इसकी भरपाई के लिए दस प्रतिशत राशि भी उपलब्ध नहीं है। नेपाल का तर्क है कि बड़े उत्सर्जक देशों को इसकी भरपाई करनी चाहिए। भारत ने नेपाल की चिंताओं को समझते हुए विकसित देशों से आह्वान किया है कि वे जलवायु वित्तपोषण के अपने वादों को पूरा करें। भारतीय विदेश मंत्रालय ने कहा कि पेरिस समझौते के तहत विकसित देशों ने प्रतिवर्ष सौ अरब डॉलर का जलवायु कोष बनाने का वादा किया था, लेकिन यह लक्ष्य अभी तक पूरा नहीं हो सका है। भारत ने कहा कि जलवायु न्याय के सिद्धांत के अनुसार, जिन देशों ने ऐतिहासिक रूप से अधिक उत्सर्जन किया है, उन्हें अधिक जिम्मेदारी लेनी चाहिए। भारत स्वयं भी नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में महत्वाकांक्षी लक्ष्यों पर काम कर रहा है और अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन जैसी पहलों के माध्यम से वैश्विक सहयोग को बढ़ावा दे रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि नेपाल की मांग जलवायु न्याय के व्यापक सिद्धांत को दर्शाती है, लेकिन मुआवजे की व्यवस्था पर अंतरराष्ट्रीय सहमति बनाना जटिल है। संयुक्त राष्ट्र महासभा में नेपाल के प्रधानमंत्री का संबोधन इस मुद्दे को वैश्विक मंच पर नई गति दे सकता है। भारत की स्थिति स्पष्ट है कि वह विकासशील देशों के साथ खड़ा है, लेकिन समाधान बहुपक्षीय मंचों और सहमति के माध्यम से ही निकाला जाना चाहिए। निष्कर्षतः, जलवायु परिवर्तन की चुनौती का सामना करने के लिए वैश्विक एकजुटता और विकसित देशों की ओर से ठोस वित्तीय प्रतिबद्धताओं की आवश्यकता है। भारत और नेपाल जैसे देशों का साझा रुख जलवायु न्याय की लड़ाई को मजबूती देता है, लेकिन वास्तविक परिवर्तन के लिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय को शब्दों से आगे बढ़कर ठोस कार्रवाई करनी होगी।