सोशल मीडिया पर 'इन्फ्लुएंसर' के तौर पर पहचाने जाने वाले स्वतंत्र भारद्वाज को दिल्ली पुलिस ने हिरासत में ले लिया है। उन पर आरोप है कि उन्होंने सिटीजन्स फॉर जस्टिस एंड पीस (सीजेपी) के एक प्रदर्शनकारी के पिता पर कथित तौर पर हमला किया था। पुलिस सूत्रों के मुताबिक, घटना के बाद भारद्वाज अपनी बुलेट मोटरसाइकिल पर सवार होकर बुलंदशहर की ओर भाग निकले थे, जिसके बाद दिल्ली पुलिस की टीम ने उनका पीछा किया और बुलंदशहर से उन्हें धर दबोचा। इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर सोशल मीडिया पर नफरत फैलाने वाले कंटेंट क्रिएटर्स की जवाबदेही पर सवाल खड़े कर दिए हैं। मामले की गंभीरता को देखते हुए दिल्ली पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए कई धाराओं में मामला दर्ज किया है। पीड़ित पक्ष का आरोप है कि भारद्वाज ने न केवल शारीरिक हमला किया, बल्कि धार्मिक भावनाओं को भड़काने वाली टिप्पणियां भी कीं। इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद दबाव बढ़ा, जिसके चलते पुलिस को तेजी से हरकत में आना पड़ा। भारद्वाज के फरार होने की कोशिश ने मामले को और पेचीदा बना दिया था, लेकिन पुलिस की मुस्तैदी से उन्हें जल्द ही पकड़ लिया गया। इस गिरफ्तारी पर प्रतिक्रिया देते हुए किशोर दलित कार्यकर्ता ने इसे 'जीत की पहली सीढ़ी' करार दिया है। उन्होंने कहा कि लंबे समय से नफरत भरे भाषण और सांप्रदायिक वैमनस्य फैलाने वालों के खिलाफ कार्रवाई नहीं हो रही थी, लेकिन अब कानून अपना काम कर रहा है। वहीं, केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान की पार्टी लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) ने भी भारद्वाज के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कर सख्त कार्रवाई की मांग की है। पार्टी ने बयान जारी कर कहा कि समाज में द्वेष फैलाने वाले किसी भी व्यक्ति को बख्शा नहीं जाना चाहिए, चाहे उसकी पहुंच कितनी भी ऊंची क्यों न हो। स्वतंत्र भारद्वाज का विवादों से पुराना नाता रहा है। उन पर पहले भी इस्लामोफोबिया फैलाने, अभिनेत्री स्वरा भास्कर समेत कई हस्तियों पर अभद्र टिप्पणी करने और सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने के आरोप लगते रहे हैं। द क्विंट की एक रिपोर्ट में सवाल उठाया गया था कि आखिर भारद्वाज इतने लंबे समय तक 'स्वतंत्र' कैसे घूमते रहे? जानकारों का मानना है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स की ढीली नीतियों और कानूनी एजेंसियों की देरी से कार्रवाई के चलते ऐसे तत्व बेखौफ होकर नफरत का कारोबार करते हैं। फिलहाल भारद्वाज पुलिस हिरासत में हैं और उनसे पूछताछ जारी है। पुलिस उनके सोशल मीडिया अकाउंट्स की भी पड़ताल कर रही है ताकि नफरत भरे कंटेंट के पैटर्न और फंडिंग स्रोतों का पता लगाया जा सके। इस मामले ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि अभिव्यक्ति की आजादी की आड़ में नफरत फैलाने वालों पर नकेल कसने के लिए और सख्त कानूनी ढांचे की जरूरत है। देखना होगा कि अदालत इस मामले में क्या रुख अपनाती है और भविष्य में ऐसे मामलों की पुनरावृत्ति रोकने के लिए क्या कदम उठाए जाते हैं।