नई दिल्ली: राजधानी के प्रतिष्ठित जंतर मंतर पर चल रहे एक प्रदर्शन के दौरान दिल्ली पुलिस की चेहरा पहचान तकनीक ने चौंकाने वाला खुलासा किया है। पुलिस कैमरों ने भीड में कम से कम 25 ऐसे व्यक्तियों की पहचान की है जो हत्या, बलात्कार और अन्य गंभीर अपराधों के आरोपी हैं और आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार वे जेल में बंद होने चाहिए। यह खुलासा न केवल सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है, बल्कि जेल प्रशासन और न्यायिक प्रक्रिया की पारदर्शिता पर भी बड़ा प्रश्नचिह्न लगाता है। विभिन्न मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शन स्थल पर लगे आधुनिक कैमरों और फेशियल रिकग्निशन सॉफ्टवेयर का उपयोग करते हुए 2,873 से अधिक हिस्ट्रीशीटर्स की स्क्रीनिंग की थी। इनमें से 162 व्यक्ति ऐसे पाए गए जो रिकॉर्ड के मुताबिक जेल में होने चाहिए थे, लेकिन वे प्रदर्शन में सक्रिय रूप से भाग ले रहे थे। विशेष रूप से, कम से कम 25 आरोपी ऐसे हैं जिन पर हत्या और बलात्कार जैसे जघन्य अपराधों के मुकदमे चल रहे हैं। पुलिस सूत्रों का कहना है कि यह तकनीकी निगरानी प्रदर्शनकारियों की पहचान और सुरक्षा खतरों का आकलन करने के लिए की गई थी। इस मामले ने तिहाड़ जेल प्रशासन और संबंधित अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर संदेह पैदा कर दिया है। सवाल उठता है कि जब ये आरोपी न्यायिक हिरासत या सजा काट रहे थे, तो वे जंतर मंतर जैसे संवेदनशील स्थान पर कैसे पहुंच गए? क्या यह जेल से अवैध छुट्टी, पैरोल का दुरुपयोग, या फिर रिकॉर्ड रखरखाव में भारी चूक का मामला है? विपक्षी दलों और नागरिक अधिकार संगठनों ने इस घटना को "प्रणालीगत विफलता" करार देते हुए उच्च स्तरीय जांच की मांग की है। दिल्ली पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों ने बताया कि पहचाने गए व्यक्तियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू कर दी गई है और जेल प्रशासन से विस्तृत रिपोर्ट मांगी गई है। साथ ही, उन पुलिसकर्मियों की भूमिका की भी जांच की जा रही है जिनकी ड्यूटी इन कैदियों की निगरानी में लगी थी। तकनीकी विशेषज्ञों का मानना है कि फेशियल रिकग्निशन तकनीक ने इस बार अपराधियों को पकड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, लेकिन इसका उपयोग निजता के अधिकारों के संतुलन के साथ किया जाना चाहिए। इस घटना ने एक बार फिर से अपराधिक न्याय प्रणाली में सुधार की आवश्यकता को रेखांकित किया है। जब तक जेलों में बंद खूंखार अपराधी खुलेआम सार्वजनिक स्थानों पर घूमते रहेंगे, तब तक आम नागरिक की सुरक्षा और कानून के प्रति विश्वास बहाल नहीं हो सकता। सरकार और न्यायपालिका को इस घटना को गंभीरता से लेते हुए दोषी अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई करनी चाहिए और ऐसी व्यवस्था बनानी चाहिए कि भविष्य में ऐसी चूक दोबारा न हो।