एस्टोनिया के रक्षा मंत्री हानो पेवर ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है, जिसके पीछे एक भारतीय स्वामित्व वाली कंपनी के साथ 70 मिलियन यूरो के गोला-बारूद आपूर्ति सौदे में कथित अनियमितताएं बताई जा रही हैं। यह सौदा यूरोपीय संघ के कोष से वित्तपोषित था और इसका उद्देश्य यूक्रेन को तोपखाने के गोले उपलब्ध कराना था। हालांकि, अनुबंध पर हस्ताक्षर होने के महीनों बाद भी एक भी गोला डिलीवर नहीं किया गया, जिसके चलते एस्टोनिया की सरकार और यूरोपीय भागीदारों में भारी नाराजगी व्याप्त हो गई। मामले की जड़ में एस्टोनिया की सरकारी खरीद एजेंसी और एक भारतीय फर्म के बीच हुआ समझौता है। रिपोर्ट्स के अनुसार, भारतीय कंपनी ने दावा किया है कि अनुबंध संबंधी विवाद और भुगतान में देरी के कारण उसे भारी वित्तीय नुकसान उठाना पड़ा है। कंपनी का आरोप है कि एस्टोनियाई पक्ष ने अनुबंध की शर्तों का उल्लंघन किया, जिसके चलते उत्पादन और आपूर्ति श्रृंखला बाधित हुई। वहीं, एस्टोनियाई अधिकारियों का कहना है कि कंपनी अनुबंध की समयसीमा और गुणवत्ता मानकों को पूरा करने में विफल रही। इस प्रकरण ने एस्टोनिया की राजनीति में भूचाल ला दिया है। प्रधानमंत्री काजा कलास ने रक्षा मंत्री का इस्तीफा स्वीकार करते हुए कहा कि इस मामले ने देश की प्रतिष्ठा और सहयोगियों के विश्वास को ठेस पहुंचाई है। संसद की राष्ट्रीय सुरक्षा समिति ने पूरे प्रकरण की गहन जांच के आदेश दिए हैं। यूरोपीय आयोग ने भी इस सौदे में खर्च हुए कोष के ऑडिट की मांग की है, क्योंकि यह राशि यूक्रेन सुविधा कोष का हिस्सा थी। भारतीय कंपनी ने अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता अदालत में जाने की चेतावनी दी है। उसका कहना है कि उसने अनुबंध के तहत सभी दायित्व पूरे करने की कोशिश की, लेकिन एस्टोनियाई पक्ष की ओर से बार-बार शर्तें बदलने और तकनीकी मंजूरी में देरी के कारण काम रुक गया। कंपनी के प्रवक्ता ने कहा कि वे अपने कानूनी अधिकारों की रक्षा के लिए सभी विकल्प तलाश रहे हैं। इस घटना ने रक्षा खरीद प्रक्रियाओं में पारदर्शिता, जवाबदेही और अंतरराष्ट्रीय अनुबंधों के प्रबंधन पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। भारत और एस्टोनिया के द्विपक्षीय संबंधों पर भी इसका असर पड़ सकता है, खासकर रक्षा सहयोग के क्षेत्र में। विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में ऐसे विवादों से बचने के लिए स्पष्ट अनुबंधीय ढांचे, स्वतंत्र निगरानी तंत्र और विवाद समाधान की त्वरित व्यवस्था अनिवार्य है।