विदेश मंत्री एस जयशंकर की हालिया कीव यात्रा ने रूस-यूक्रेन संघर्ष पर भारत के दृढ़ और संतुलित रुख को एक बार फिर वैश्विक मंच पर रेखांकित कर दिया है। अमेरिका द्वारा रूसी तेल खरीदारों पर प्रतिबंध लगाने के संकेतों के बीच, भारत ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि युद्ध का समाधान कूटनीति और संवाद से ही संभव है, न कि ऊर्जा प्रतिबंधों या एकपक्षीय दबाव से। जयशंकर ने यूक्रेन की राजधानी कीव में राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की से मुलाकात के बाद दोहराया कि भारत किसी भी रूप में शांति स्थापना के लिए सहयोग देने को तैयार है, लेकिन वह अपनी रणनीतिक स्वायत्तता और राष्ट्रीय हितों से समझौता नहीं करेगा। यात्रा के दौरान विदेश मंत्री ने यूक्रेनी नेतृत्व को आश्वस्त किया कि भारत संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के सिद्धांतों का सम्मान करता है, साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि तेल खरीदना या न खरीदना इस जटिल संघर्ष का हल नहीं है। जयशंकर ने कहा, "यह युद्ध का समय नहीं है," जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पहले के बयान की पुनरावृत्ति है। उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत बातचीत की मेज पर लौटने के लिए सभी पक्षों को प्रोत्साहित करता रहेगा। इस यात्रा में पोलैंड का पड़ाव भी शामिल था, जहां क्षेत्रीय सुरक्षा और मानवीय सहायता पर चर्चा हुई। अमेरिका और पश्चिमी देशों द्वारा रूसी तेल पर मूल्य सीमा लगाने और खरीदारों को दंडित करने की रणनीति पर भारत का रुख व्यावहारिक रहा है। नई दिल्ली ने बार-बार कहा है कि ऊर्जा सुरक्षा विकासशील देशों के लिए सर्वोपरि है और वह सस्ते रूसी तेल की खरीद जारी रखेगा। जयशंकर ने कीव में पत्रकारों से बातचीत में इस तर्क को मजबूती से रखा कि भारत की ऊर्जा जरूरतें वैश्विक बाजार की अस्थिरता से प्रभावित होती हैं और वह अपने नागरिकों के हित में निर्णय लेता रहेगा। इस स्पष्टवादिता की अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक हलकों में सराहना भी हुई है। राष्ट्रपति जेलेंस्की ने जयशंकर के साथ बैठक के बाद भारत की स्थिति को "स्पष्ट" और "सैद्धांतिक" बताते हुए सराहना की। उन्होंने शांति सूत्र पर भारत के समर्थन की उम्मीद जताई। वहीं, भारत ने मानवीय आधार पर यूक्रेन को चिकित्सा उपकरण, दवाएं और अन्य राहत सामग्री भेजना जारी रखा है। यह दोहरा दृष्टिकोण - सिद्धांतों पर दृढ़ता और मानवीय सहानुभूति - भारत की वैश्विक छवि को एक जिम्मेदार शक्ति के रूप में मजबूत करता है, जो न तो किसी गुट का पिछलग्गू है और न ही मानवीय संकट से मुंह मोड़ता है। निष्कर्षतः, जयशंकर की यह यात्रा भारतीय कूटनीति की परिपक्वता का प्रमाण है। इसने यह संदेश दिया है कि वैश्विक संघर्षों के समाधान के लिए सैन्य शक्ति या आर्थिक हथियारों की तुलना में संवाद और कूटनीति ही स्थायी मार्ग हैं। भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा और रणनीतिक स्वायत्तता की रक्षा करते हुए शांति के पक्ष में अपनी आवाज बुलंद की है। आने वाले समय में देखना होगा कि क्या यह पहल युद्धरत पक्षों को बातचीत की मेज तक लाने में उत्प्रेरक की भूमिका निभा पाती है, लेकिन भारत ने अपना कर्तव्य निभा दिया है।