नेपाल और तिब्बत में आई भीषण बाढ़ ने तबाही का ऐसा मंजर खड़ा कर दिया है जिसने पूरे क्षेत्र को हिलाकर रख दिया है। ताजा आंकड़ों के अनुसार इस प्राकृतिक आपदा में मरने वालों की संख्या 1,243 तक पहुंच गई है, जबकि हजारों लोग अभी भी लापता बताए जा रहे हैं। नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने इस त्रासदी के लिए सीधे तौर पर जलवायु परिवर्तन को जिम्मेदार ठहराया है और अंतरराष्ट्रीय समुदाय से जलवायु न्याय की मांग उठाई है। यह बाढ़ पिछले कई दशकों की सबसे विनाशकारी प्राकृतिक आपदा मानी जा रही है जिसने नेपाल के कई जिलों और तिब्बत के सीमावर्ती इलाकों को अपनी चपेट में ले लिया। बाढ़ के बाद के हालात बेहद भयावह हैं। हजारों परिवार बेघर हो गए हैं और राहत शिविरों में शरण लेने को मजबूर हैं। लापता लोगों के परिजन प्रतीकात्मक अंतिम संस्कार कर रहे हैं क्योंकि शवों का पता नहीं चल पा रहा है। नेपाल सरकार ने राहत और बचाव कार्य के लिए सेना, पुलिस और स्वयंसेवी संगठनों को तैनात किया है, लेकिन दुर्गम पहाड़ी इलाकों और खराब मौसम के कारण ऑपरेशन में भारी दिक्कतें आ रही हैं। तिब्बत की तरफ से आ रही खबरों पर चीन ने सख्त नियंत्रण लगा रखा है और सोशल मीडिया पर बाढ़ संबंधी वीडियो और खबरें हटाई जा रही हैं, जिससे वास्तविक स्थिति का पता लगाना मुश्किल हो रहा है। नेपाल ने इस त्रासदी के बाद अंतरराष्ट्रीय मंच पर जलवायु न्याय का मुद्दा जोर-शोर से उठाया है। प्रधानमंत्री ओली ने स्पष्ट कहा है कि बड़े औद्योगिक देशों द्वारा किए जा रहे कार्बन उत्सर्जन का खामियाजा नेपाल जैसे छोटे और कमजोर देशों को भुगतना पड़ रहा है। नेपाल का तर्क है कि हिमालयी क्षेत्र जलवायु परिवर्तन के प्रति बेहद संवेदनशील है और ग्लेशियर पिघलने, असामान्य बारिश और चरम मौसम की घटनाओं की आवृत्ति बढ़ रही है। नेपाल ने प्रदूषक देशों से मुआवजे और जलवायु अनुकूलन के लिए वित्तीय सहायता की मांग की है। विशेषज्ञों का मानना है कि नेपाल का जलवायु न्याय का दावा मजबूत है क्योंकि हिमालयी देश वैश्विक उत्सर्जन में नगण्य योगदान देते हैं लेकिन जलवायु परिवर्तन के सबसे बुरे प्रभाव झेलते हैं। पेरिस समझौते के तहत विकसित देशों ने विकासशील देशों को जलवायु वित्त प्रदान करने का वादा किया था, लेकिन वह पूरा नहीं हुआ है। इस त्रासदी ने एक बार फिर जलवायु परिवर्तन के खतरों और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की तत्काल आवश्यकता को उजागर कर दिया है। इस भीषण त्रासदी ने न केवल जान-माल का भारी नुकसान किया है बल्कि यह जलवायु परिवर्तन की भयावह वास्तविकता का जीता-जागता सबूत भी है। नेपाल और तिब्बत के लोगों के पुनर्वास और राहत के लिए तत्काल अंतरराष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता है। साथ ही दुनिया के बड़े देशों को अपनी जिम्मेदारी समझते हुए कार्बन उत्सर्जन कम करने और जलवायु वित्त मुहैया कराने के वादे पूरे करने होंगे, ताकि भविष्य में ऐसी त्रासदियों को रोका जा सके।