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Breaking News: एससीओ शिखर सम्मेलन के बाद अमेरिका की चेतावनी: "कोई भी देश ईरान की मदद न करे", रूबियो का प्रतिबंधों पर सख्त रुख
🕒 6 days ago

किर्गिस्तान के बिश्केक में संपन्न हुए शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान की मुलाकात के बाद अमेरिका की ओर से कड़ी प्रतिक्रिया सामने आई है। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने स्पष्ट शब्दों में चेतावनी जारी करते हुए कहा है कि कोई भी राष्ट्र ईरान को प्रतिबंधों से बचने में सहायता न करे। इस बयान ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में एक नई बहस को जन्म दे दिया है, खासकर भारत के संदर्भ में, जो एससीओ का एक प्रमुख सदस्य है और ईरान के साथ अपने ऐतिहासिक संबंधों को महत्व देता है। मार्को रूबियो ने अपने बयान में इस बात पर जोर दिया कि प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति पेजेश्कियान के बीच हुई वार्ता में व्यापारिक मुद्दों पर चर्चा नहीं हुई, फिर भी अमेरिका अपनी 'अधिकतम दबाव' की नीति पर कायम है। रूबियो ने दोहराया कि ईरान पर लगे प्रतिबंध अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा के लिए आवश्यक हैं, और किसी भी देश द्वारा इन प्रतिबंधों का उल्लंघन करना या ईरान को आर्थिक राहत पहुंचाना स्वीकार्य नहीं होगा। अमेरिकी विदेश मंत्री का यह बयान भारत-ईरान संबंधों की जटिलताओं को रेखांकित करता है, जहां भारत को अपनी रणनीतिक स्वायत्तता और अमेरिकी दबाव के बीच संतुलन साधना पड़ता है। भारत की ओर से इस मुलाकात को द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने और क्षेत्रीय संपर्कता, विशेषकर चाबहार बंदरगाह परियोजना को आगे बढ़ाने के संदर्भ में देखा जा रहा है। विदेश मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार, दोनों नेताओं ने क्षेत्रीय सुरक्षा, आतंकवाद विरोधी सहयोग और अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे (आईएनएसटीसी) पर सार्थक चर्चा की। भारत ने हमेशा कहा है कि उसके ईरान के साथ संबंध स्वतंत्र हैं और वह अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर निर्णय लेता है। हालांकि, अमेरिकी प्रतिबंधों की छाया इन संबंधों पर लंबे समय से पड़ती रही है, जिससे बैंकिंग चैनल और ऊर्जा व्यापार प्रभावित होते रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि रूबियो की यह चेतावनी एससीओ मंच पर बढ़ते ईरान के प्रभाव और भारत की सक्रिय भागीदारी को लेकर अमेरिका की बेचैनी को दर्शाती है। एससीओ में ईरान की पूर्ण सदस्यता के बाद यह पहला बड़ा शिखर सम्मेलन था, जहां भारत ने ईरान के साथ अपने जुड़ाव को खुलकर प्रदर्शित किया। अमेरिका नहीं चाहता कि कोई भी बड़ा देश ईरान को आर्थिक जीवनदान दे, जिससे उसके परमाणु कार्यक्रम पर दबाव कम हो। ऐसे में भारत के सामने कूटनीतिक चुनौती है कि वह चाबहार जैसे रणनीतिक प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाते हुए अमेरिकी प्रतिबंधों के कानूनी दायरे में कैसे रहे। निष्कर्ष के तौर पर कहा जा सकता है कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों की इस शतरंज की बिसात पर भारत अपनी चालें बड़ी सावधानी से चल रहा है। प्रधानमंत्री मोदी की ईरानी राष्ट्रपति से मुलाकात भारत की 'रणनीतिक स्वायत्तता' की नीति का प्रमाण है, वहीं अमेरिका की चेतावनी वैश्विक व्यवस्था में उसके प्रभुत्व को बनाए रखने का प्रयास। आने वाले समय में देखना होगा कि भारत चाबहार बंदरगाह और आईएनएसटीसी जैसी महत्वाकांक्षी परियोजनाओं को अमेरिकी प्रतिबंधों की बाधाओं से पार कैसे ले जाता है, बिना अपने पश्चिमी सहयोगियों को नाराज किए। यह घटनाक्रम वैश्विक भू-राजनीति में उभरते नए समीकरणों का स्पष्ट संकेत है।

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✍️ By Pradeep Yadav | 03 Sep 2026