अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन में विदेश मंत्री पद के लिए नामित मार्को रुबियो ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान की हालिया मुलाकात पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। रुबियो ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि उन्हें नहीं लगता कि भारत और ईरान के बीच किसी प्रकार का कोई सौदा हो रहा है। यह बयान ऐसे समय आया है जब ब्राजील में आयोजित जी-20 शिखर सम्मेलन से इतर दोनों नेताओं की द्विपक्षीय वार्ता हुई थी, जिसमें क्षेत्रीय सुरक्षा, चाबहार बंदरगाह परियोजना और पश्चिम एशिया के तनावपूर्ण हालात पर चर्चा हुई थी। रुबियो ने सीनेट की विदेश संबंध समिति के समक्ष अपने नामांकन की पुष्टि के लिए हुई सुनवाई के दौरान सांसदों के सवालों का जवाब देते हुए यह टिप्पणी की। उन्होंने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि कोई भी देश ईरान को प्रतिबंधों से बचने में मदद न करे। रुबियो का यह रुख ट्रंप प्रशासन की 'अधिकतम दबाव' की नीति का स्पष्ट संकेत माना जा रहा है, जिसके तहत ईरान के तेल निर्यात और वित्तीय तंत्र पर कठोर प्रतिबंध लगाए जाने की योजना है। उन्होंने ईरान को क्षेत्रीय अस्थिरता का प्रमुख स्रोत बताते हुए उसके परमाणु कार्यक्रम और प्रॉक्सी समूहों को समर्थन पर गहरी चिंता जताई। भारत की ओर से इस मुलाकात को लेकर आधिकारिक बयान में कहा गया था कि प्रधानमंत्री मोदी ने क्षेत्र में शांति और स्थिरता का आह्वान किया तथा समुद्री मार्गों की सुरक्षा, विशेषकर लाल सागर क्षेत्र में जहाजों की आवाजाही पर जोर दिया। विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि चाबहार बंदरगाह परियोजना मानवीय सहायता और क्षेत्रीय संपर्कता के लिए महत्वपूर्ण है और यह अंतरराष्ट्रीय कानूनों के दायरे में संचालित होती है। भारत ने हमेशा की तरह संवाद और कूटनीति के माध्यम से मतभेद सुलझाने की अपनी नीति दोहराई। कूटनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि रुबियो का यह बयान भारत-अमेरिका रणनीतिक साझेदारी की जटिलताओं को दर्शाता है। जहां एक ओर अमेरिका भारत को हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन के खिलाफ एक प्रमुख साझेदार मानता है, वहीं ईरान के साथ भारत के ऐतिहासिक संबंध और ऊर्जा सुरक्षा की जरूरतें इसे एक संतुलन साधने की चुनौती बनाती हैं। चाबहार बंदरगाह अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक भारत की पहुंच का एकमात्र व्यावहारिक मार्ग है, जिससे भारत पीछे हटने को तैयार नहीं है। आने वाले दिनों में ट्रंप प्रशासन की नीतियों का असर भारत-ईरान संबंधों पर कितना पड़ता है, यह देखना होगा। फिलहाल भारत ने अपनी स्वतंत्र विदेश नीति के अनुरूप चलने के संकेत दिए हैं। रुबियो की चेतावनी के बावजूद नई दिल्ली अपने राष्ट्रीय हितों, विशेषकर ऊर्जा सुरक्षा और क्षेत्रीय संपर्कता के मुद्दों पर तेहरान के साथ व्यावहारिक सहयोग जारी रखने की रणनीति पर कायम रह सकती है। यह स्थिति दक्षिण एशिया और पश्चिम एशिया की भू-राजनीति में भारत की विशिष्ट भूमिका को रेखांकित करती है।