नेपाल में आई विनाशकारी बाढ़ ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया है। इस प्राकृतिक आपदा में मरने वालों की संख्या 1,200 को पार कर गई है, जबकि 4,000 से अधिक लोग अब भी लापता बताए जा रहे हैं। बीते एक सप्ताह से जारी राहत और बचाव कार्यों के बीच नेपाल के प्रधानमंत्री ने भारत और चीन की ओर से भेजी गई त्वरित सहायता के लिए दोनों पड़ोसी देशों का हार्दिक आभार व्यक्त किया है। इस संकट की घड़ी में अंतरराष्ट्रीय सहयोग की सराहना करते हुए उन्होंने कहा कि यह मुश्किल समय में मानवता और पड़ोसी धर्म का उत्कृष्ट उदाहरण है। हालांकि, राहत कार्यों के समानांतर नेपाल सरकार के एक वरिष्ठ मंत्री ने बाढ़ से हुए भारी नुकसान के लिए मुआवजे की मांग उठाकर एक नई बहस को जन्म दे दिया है। मंत्री का तर्क है कि जलवायु परिवर्तन और अनियोजित विकास गतिविधियों के लिए प्रमुख रूप से जिम्मेदार बड़े देशों, विशेषकर चीन, अमेरिका और भारत को नेपाल को हुई क्षति की भरपाई करनी चाहिए। इस बयान ने कूटनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है, क्योंकि एक ओर प्रधानमंत्री सहयोग के लिए धन्यवाद दे रहे हैं, वहीं दूसरी ओर कैबिनेट सहयोगी मुआवजे की बात कर रहे हैं। बाढ़ की विभीषिका का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पूरे के पूरे गांव पानी में समा गए हैं, सड़कें और पुल बह गए हैं, तथा हजारों परिवार बेघर होकर राहत शिविरों में रहने को मजबूर हैं। 'नेचर्स फ्यूरी' यानी प्रकृति के प्रकोप के रूप में वर्णित इस त्रासदी ने नेपाल के कमजोर बुनियादी ढांचे और आपदा प्रबंधन प्रणाली की पोल खोल दी है। राहतकर्मी दिन-रात मलबे में दबे लोगों को निकालने और लापता लोगों की तलाश में जुटे हैं, लेकिन खराब मौसम और दुर्गम इलाके उनके प्रयासों में बाधा बन रहे हैं। इस भयानक मंजर के बीच एक 'चमत्कारी घर' की कहानी भी सामने आई है, जो बाढ़ की भीषण धारा के बीच अडिग खड़ा रहा। इस घर ने स्थानीय लोगों के लिए उम्मीद की किरण जगाई है और आपदा-रोधी निर्माण तकनीकों की ओर ध्यान आकर्षित किया है। विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में ऐसी त्रासदियों से निपटने के लिए नेपाल को न केवल मजबूत बुनियादी ढांचे में निवेश करना होगा, बल्कि जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने के लिए क्षेत्रीय और वैश्विक स्तर पर ठोस रणनीति भी बनानी होगी। निष्कर्षतः, नेपाल इस समय अपने इतिहास के सबसे कठिन दौर से गुजर रहा है। भारत और चीन की तत्काल सहायता राहत कार्यों के लिए संजीवनी साबित हो रही है, लेकिन मुआवजे की मांग ने जलवायु न्याय के जटिल मुद्दे को फिर से रेखांकित किया है। आवश्यकता इस बात की है कि तात्कालिक राहत के साथ-साथ दीर्घकालिक पुनर्निर्माण और जलवायु अनुकूलन पर गंभीरता से ध्यान केंद्रित किया जाए, ताकि भविष्य में ऐसी विभीषिका की पुनरावृत्ति न हो।