भारत ने पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के नारोवाल जिले के सिराज गांव में स्थित 125 वर्ष पुराने हिंदू मंदिर के विध्वंस पर कड़ा विरोध दर्ज कराया है। विदेश मंत्रालय ने इस घटना को 'विध्वंस का निंदनीय कृत्य' करार देते हुए पाकिस्तान सरकार से अल्पसंख्यक समुदायों के धार्मिक स्थलों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की है। भारत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि इस तरह की घटनाएं पाकिस्तान में हिंदू अल्पसंख्यकों की धार्मिक स्वतंत्रता और सांस्कृतिक विरासत पर लगातार हो रहे हमलों का एक और उदाहरण हैं। इस प्राचीन मंदिर का ध्वस्त होना न केवल हिंदू समुदाय की आस्था पर आघात है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानदंडों का भी घोर उल्लंघन है। पाकिस्तानी मीडिया की रिपोर्ट्स के अनुसार, यह मंदिर 19वीं सदी के अंत में बनाया गया था और यह क्षेत्र के हिंदू समुदाय की आस्था का प्रमुख केंद्र था। स्थानीय निवासियों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का आरोप है कि मंदिर को जानबूझकर ढहाया गया है ताकि उसकी जमीन पर मदरसा बनाया जा सके। हालांकि, पाकिस्तान की इवैक्यूई ट्रस्ट प्रॉपर्टी बोर्ड (ईटीपीबी) और स्थानीय प्रशासन ने दावा किया है कि भारी बारिश के कारण मंदिर का एक हिस्सा स्वयं ढह गया था। लेकिन प्रत्यक्षदर्शियों और सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में साफ दिख रहा है कि भारी मशीनरी का उपयोग करके मंदिर को व्यवस्थित ढंग से ध्वस्त किया गया है। इस घटना ने पाकिस्तान में अल्पसंख्यक अधिकारों की स्थिति पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस घटना के बाद भारत में भी तीव्र प्रतिक्रिया देखने को मिली है। बजरंग दल और अन्य हिंदू संगठनों ने देश के विभिन्न हिस्सों में विरोध प्रदर्शन किए और पाकिस्तान सरकार के खिलाफ नारेबाजी की। प्रदर्शनकारियों ने मांग की कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय को पाकिस्तान पर दबाव डालना चाहिए ताकि वह अल्पसंख्यकों के धार्मिक स्थलों की रक्षा करे। भारत सरकार ने राजनयिक चैनलों के माध्यम से पाकिस्तान के समक्ष इस मामले को उठाया है और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की है। साथ ही, भारत ने यूनेस्को और अन्य अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से भी अपील की है कि वे पाकिस्तान में हिंदू धरोहर स्थलों के संरक्षण के लिए हस्तक्षेप करें। पाकिस्तान में हिंदू मंदिरों पर हमले की यह कोई पहली घटना नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में सिंध, पंजाब और खैबर पख्तूनख्वा में कई प्राचीन मंदिरों को निशाना बनाया गया है। मानवाधिकार संगठनों की रिपोर्ट बताती है कि 1947 में विभाजन के समय पाकिस्तान में 400 से अधिक ऐतिहासिक मंदिर थे, जिनमें से अब केवल कुछ दर्जन ही बचे हैं। अधिकांश या तो उपेक्षा के शिकार हो गए या फिर कट्टरपंथी तत्वों द्वारा नष्ट कर दिए गए। ईटीपीबी पर अक्सर आरोप लगते रहे हैं कि वह मंदिरों की संपत्तियों की रक्षा करने में विफल रहा है और कई बार भूमि माफिया के साथ मिलीभगत के आरोप भी लगे हैं। निष्कर्ष के तौर पर, यह घटना पाकिस्तान में धार्मिक सहिष्णुता और अल्पसंख्यक अधिकारों की दयनीय स्थिति को उजागर करती है। अंतरराष्ट्रीय बिरादरी को इस मामले का संज्ञान लेते हुए पाकिस्तान पर दबाव बनाना चाहिए कि वह अपने संवैधानिक दायित्वों का पालन करे और सभी नागरिकों की धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा करे। भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि वह इस मुद्दे को हर उचित मंच पर उठाता रहेगा और पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के मानवाधिकारों के हनन के खिलाफ आवाज बुलंद करता रहेगा।