नेपाल में आई विनाशकारी बाढ़ ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया है। ताजा आंकड़ों के अनुसार इस प्राकृतिक आपदा में मरने वालों की संख्या 1,204 तक पहुंच गई है, जबकि सैकड़ों लोग अब भी लापता हैं। लगातार हुई मूसलाधार बारिश और भूस्खलन ने नेपाल के कई जिलों को पूरी तरह से तबाह कर दिया है। राजधानी काठमांडू समेत तराई क्षेत्र के अनेक गांव और शहर जलमग्न हो गए हैं, जिससे लाखों लोग बेघर हो गए हैं। राहत और बचाव कार्य युद्ध स्तर पर चल रहे हैं, लेकिन दुर्गम पहाड़ी इलाकों और टूटी सड़कों के कारण प्रभावित क्षेत्रों तक मदद पहुंचाने में भारी दिक्कतें आ रही हैं। इस भयावह त्रासदी के बीच नेपाल सरकार ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से मदद की गुहार लगाई है। प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली की सरकार ने स्पष्ट किया है कि वे दान या खैरात नहीं, बल्कि जलवायु परिवर्तन के लिए जिम्मेदार प्रमुख देशों से मुआवजा चाहते हैं। नेपाल का तर्क है कि कार्बन उत्सर्जन में उसकी हिस्सेदारी न के बराबर है, फिर भी वह जलवायु परिवर्तन की सबसे बुरी मार झेल रहा है। नेपाल ने भारत, चीन और अमेरिका जैसे बड़े उत्सर्जक देशों से आर्थिक सहायता की मांग की है। काठमांडू के मेयर बालेन शाह ने तो यहां तक संकेत दिए हैं कि वे इस मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र में उठा सकते हैं। बाढ़ के बाद अब नेपाल के सामने एक और बड़ा संकट खड़ा हो गया है - जनस्वास्थ्य का। पेयजल और स्वच्छता व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो जाने से हैजा, टाइफाइड, डेंगू और अन्य जलजनित बीमारियों के फैलने का खतरा मंडरा रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन और रेड क्रॉस ने चेतावनी दी है कि अगर तुरंत स्वच्छ पानी और चिकित्सा सुविधाएं मुहैया नहीं कराई गईं तो महामारी भयानक रूप ले सकती है। अस्पताल पहले से ही मरीजों से भरे पड़े हैं और दवाओं की किल्लत हो रही है। राहत शिविरों में रह रहे हजारों परिवारों के लिए साफ पानी और शौचालय की व्यवस्था करना प्रशासन के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गया है। भारत ने पड़ोसी धर्म निभाते हुए त्वरित सहायता भेजी है। भारतीय वायुसेना के हेलीकॉप्टर राहत सामग्री और मेडिकल टीमों के साथ नेपाल के दूरदराज इलाकों में पहुंच रहे हैं। एनडीआरएफ की टीमें बचाव अभियान में जुटी हैं। चीन ने भी आर्थिक सहायता और राहत सामग्री भेजने की घोषणा की है। अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों ने भी मानवीय सहायता का आश्वासन दिया है। लेकिन नेपाल की मुआवजे की मांग ने जलवायु न्याय की बहस को फिर से तेज कर दिया है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह मांग विकासशील देशों की उस आवाज को बुलंद करती है जो लंबे समय से 'लॉस एंड डैमेज' फंड की मांग कर रहे हैं। नेपाल की इस त्रासदी ने जलवायु परिवर्तन के विनाशकारी प्रभावों को एक बार फिर उजागर किया है। हिमालयी क्षेत्र की नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र पर बढ़ते तापमान का असर साफ दिख रहा है। ग्लेशियर पिघल रहे हैं, मानसून का पैटर्न बदल रहा है और चरम मौसम की घटनाएं बढ़ रही हैं। नेपाल के पुनर्निर्माण के लिए अरबों रुपये की जरूरत होगी। अंतरराष्ट्रीय समुदाय को तात्कालिक राहत के साथ-साथ दीर्घकालिक जलवायु अनुकूलन और लचीलापन बनाने में नेपाल की मदद करनी होगी। यह त्रासदी पूरी दुनिया के लिए चेतावनी है कि जलवायु कार्रवाई में देरी अब और जिंदगियों की कीमत पर नहीं हो सकती।