नेपाल में आई भीषण बाढ़ और भूस्खलन ने भारी तबाही मचाई है, जिसमें मरने वालों की संख्या एक हजार को पार कर गई है जबकि हजारों लोग अब भी लापता बताए जा रहे हैं। इस प्राकृतिक आपदा ने न केवल नेपाल के पहाड़ी इलाकों को तबाह किया है, बल्कि तराई क्षेत्र के मैदानी इलाकों में भी जनजीवन अस्त-व्यस्त कर दिया है। नेपाल सरकार ने इस त्रासदी के लिए भारत, अमेरिका और चीन जैसे बड़े उत्सर्जक देशों को जिम्मेदार ठहराते हुए स्पष्ट कहा है कि उन्हें सहायता नहीं, बल्कि जलवायु मुआवजा चाहिए। नेपाल के प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल 'प्रचंड' ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर कहा कि जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालयी देशों को असमान रूप से नुकसान झेलना पड़ रहा है, जबकि उनका कार्बन उत्सर्जन में योगदान नगण्य है। बाढ़ की विभीषिका का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि काठमांडू घाटी समेत कई जिलों में शवगृह भर चुके हैं और प्रशासन को सामूहिक अंतिम संस्कार का सहारा लेना पड़ रहा है। राहत एवं बचाव कार्य में लगे सुरक्षाकर्मी और स्वयंसेवक दिन-रात मलबे में दबे लोगों को निकालने में जुटे हैं, लेकिन खराब मौसम और टूटी सड़कें अभियान में बाधा बन रही हैं। नेपाल के गृह मंत्रालय के अनुसार, सबसे अधिक प्रभावित जिलों में सिंधुपालचौक, काव्रे, दोलखा और मकवानपुर शामिल हैं, जहां पूरे के पूरे गांव बह गए हैं। वहीं, दिल्ली में रहने वाले नेपाली समुदाय के लोग अपने परिजनों की तलाश में परेशान हैं; कई परिवारों को अब तक अपनों का कोई सुराग नहीं मिला है। इस त्रासदी ने नेपाल की पूर्व चेतावनी प्रणाली की खामियों को भी उजागर कर दिया है। विशेषज्ञों का कहना है कि कई इलाकों में सायरन तक नहीं बजे और लोगों को अचानक आई बाढ़ से बचने का समय नहीं मिला। ग्रामीण क्षेत्रों में सूचना तंत्र कमजोर होने के कारण लोग ऊंचे स्थानों पर नहीं जा सके। नेपाल के मौसम विभाग ने भारी बारिश का अलर्ट जारी किया था, लेकिन जमीनी स्तर पर उसका प्रसार नहीं हो सका। जलवायु वैज्ञानिकों का मानना है कि हिमालय में ग्लेशियर पिघलने और मानसून के पैटर्न में बदलाव के कारण ऐसी चरम मौसमी घटनाएं भविष्य में और बढ़ेंगी। नेपाल ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से 'लॉस एंड डैमेज' कोष के तहत मुआवजे की मांग तेज कर दी है। काठमांडू में आयोजित एक प्रेस वार्ता में नेपाल के वन एवं पर्यावरण मंत्री ने कहा कि विकसित देशों के ऐतिहासिक उत्सर्जन की कीमत नेपाल जैसे गरीब देश चुका रहे हैं। उन्होंने COP29 से पहले विकसित देशों से वित्तीय प्रतिबद्धताएं पूरी करने का आह्वान किया। वहीं, भारत ने नेपाल को मानवीय सहायता भेजने की घोषणा की है, लेकिन नेपाल का रुख स्पष्ट है कि दीर्घकालिक समाधान मुआवजे और जलवायु न्याय में निहित है, न कि तात्कालिक राहत में। इस भीषण आपदा ने एक बार फिर जलवायु परिवर्तन के विनाशकारी प्रभावों को सामने ला दिया है। नेपाल की त्रासदी केवल उसकी नहीं, बल्कि पूरे हिमालयी क्षेत्र और वैश्विक दक्षिण के लिए चेतावनी है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय को अब शब्दों से आगे बढ़कर ठोस वित्तीय और तकनीकी सहयोग देना होगा, ताकि भविष्य में ऐसी तबाही रोकी जा सके। नेपाल के पुनर्निर्माण में वर्षों लगेंगे, लेकिन न्याय की लड़ाई अभी शुरू हुई है।