भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) ने चिंताजनक पूर्वानुमान जारी करते हुए कहा है कि सितंबर महीने में देशभर में सामान्य से कम बारिश होने की प्रबल संभावना है। यह खबर तब आई है जब अगस्त महीने ने 1901 के बाद से अब तक का सबसे गर्म अगस्त होने का रिकॉर्ड बनाया है। मौसम विभाग के अनुसार, सितंबर में दीर्घावधि औसत (एलपीए) की तुलना में 94 प्रतिशत से भी कम वर्षा दर्ज की जा सकती है, जो कृषि और जल संसाधनों के लिहाज से गंभीर संकेत है। इस पूरे मानसून सीजन में अब तक देश में लगभग 13 प्रतिशत की बारिश की कमी दर्ज की गई है, जिसने खरीफ सीजन की फसलों की पैदावार पर गहरा असर डालने की आशंका को बल दिया है। मौसम वैज्ञानिकों का मानना है कि अल नीनो की प्रबल होती स्थितियों और हिंद महासागर में अनुकूल न होने वाले वायुमंडलीय परिसंचरण के कारण मानसून की धारा कमजोर पड़ी है। अगस्त महीने में बारिश की लंबी खेंच ने न केवल तापमान को रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचाया, बल्कि मिट्टी की नमी को भी पूरी तरह सोख लिया। इसका सीधा असर धान, दलहन, तिलहन और मोटे अनाज जैसी प्रमुख खरीफ फसलों की वृद्धि पर पड़ा है। कई राज्यों में किसानों को सिंचाई के लिए भूजल का अत्यधिक दोहन करना पड़ा है, जिससे उत्पादन लागत बढ़ गई है और भविष्य में जल संकट गहराने का खतरा पैदा हो गया है। सबसे चिंताजनक पहलू बारिश का असमान भौगोलिक वितरण है। जहां पूर्वोत्तर और हिमालयी राज्यों के कुछ हिस्सों में बाढ़ जैसे हालात बने, वहीं मध्य भारत, दक्षिणी प्रायद्वीप और गंगा के मैदानी इलाकों के बड़े भाग सूखे की चपेट में हैं। महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना, झारखंड, बिहार और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई जिलों में बारिश का घाटा 30 से 50 प्रतिशत तक पहुंच गया है। इस विषमता ने फसल बीमा योजनाओं और सरकारी राहत तंत्र के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं, क्योंकि एक ही राज्य के अलग-अलग जिलों में हालात बिल्कुल विपरीत हैं। कृषि विशेषज्ञों का अनुमान है कि यदि सितंबर के पहले पखवाड़े में भी अच्छी बारिश नहीं हुई तो धान की रोपाई वाले इलाकों में पैदावार में 10 से 15 प्रतिशत तक की गिरावट आ सकती है। दलहनी फसलों जैसे अरहर, मूंग और उड़द पर भी प्रतिकूल असर पड़ने की आशंका है, जिससे आने वाले महीनों में इनकी कीमतों में उछाल आ सकता है। सरकार पहले से ही गेहूं और चावल के निर्यात पर प्रतिबंध लगा चुकी है और अब खाद्य तेलों व दालों के भंडारण पर भी कड़ी नजर रखी जा रही है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर इसका असर मजदूरी दरों और ग्रामीण मांग में कमी के रूप में दिखने लगा है। निष्कर्ष के तौर पर कहा जा सकता है कि इस वर्ष का मानसून जलवायु परिवर्तन की बढ़ती अनिश्चितता का एक और प्रमाण है। केवल कुल बारिश के आंकड़े ही नहीं, बल्कि उसका समय और वितरण भी कृषि के लिए निर्णायक साबित हो रहा है। सरकार को अब दीर्घकालिक रणनीति के तहत जल संरक्षण, सूक्ष्म सिंचाई और जलवायु-अनुकूल फसल चक्र को बढ़ावा देना होगा। साथ ही, फसल बीमा और मौसम आधारित सलाह सेवाओं को किसानों तक अधिक प्रभावी ढंग से पहुंचाना होगा, ताकि भविष्य में ऐसे मौसमी झटकों से खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण आजीविका को सुरक्षित रखा जा सके।