वैश्विक अनिश्चितताओं और पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था ने चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में सात दशमलव आठ प्रतिशत की आश्चर्यजनक वृद्धि दर हासिल करके सभी अनुमानों को पीछे छोड़ दिया है। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार अप्रैल से जून तिमाही में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की यह रफ्तार पिछले एक वर्ष का उच्चतम स्तर है। विशेषज्ञों का मानना था कि ईरान-इजराइल संघर्ष के कारण कच्चे तेल की कीमतों में उछाल और वैश्विक मांग में सुस्ती का असर घरेलू अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा, लेकिन मजबूत घरेलू खपत, निर्माण क्षेत्र में तेजी और सेवा क्षेत्र के दमदार प्रदर्शन ने इन आशंकाओं को निर्मूल साबित कर दिया। इस ऐतिहासिक उपलब्धि पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नई दिल्ली में एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि ये आंकड़े भारत की मजबूत बुनियाद और सही नीतियों का प्रमाण हैं। उन्होंने विपक्ष पर तीखा प्रहार करते हुए 'झूठ की गूंज' शब्द का प्रयोग किया और आरोप लगाया कि कुछ दल निरंतर नकारात्मकता फैलाकर देश की प्रगति को कमतर आंकने का प्रयास करते रहे हैं। प्रधानमंत्री ने इस अवसर पर स्वदेशी भावना को फिर से जगाते हुए नागरिकों से आग्रह किया कि वे विदेशी सोना खरीदने से बचें और विदेशों में विवाह आयोजन के बजाय देश में ही समारोह करें, ताकि पूंजी देश के भीतर रहे और विकास की गति बनी रहे। दूसरी ओर प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस ने इन आंकड़ों को 'विकृत तस्वीर' करार देते हुए खारिज कर दिया। पार्टी के वरिष्ठ प्रवक्ता ने कहा कि सरकारी आंकड़े जमीनी हकीकत से मेल नहीं खाते क्योंकि बेरोजगारी अब भी चरम पर है, ग्रामीण मांग सुस्त बनी हुई है और असंगठित क्षेत्र की बदहाली इन संख्याओं में परिलक्षित नहीं होती। उन्होंने आरोप लगाया कि सांख्यिकीय पद्धति में बार-बार किए गए परिवर्तनों ने विकास दर को कृत्रिम रूप से बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया है। कांग्रेस ने मांग की कि एक स्वतंत्र विशेषज्ञ समिति द्वारा इन आंकड़ों की समीक्षा कराई जाए। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि विनिर्माण क्षेत्र में नौ दशमलव एक प्रतिशत और निर्माण क्षेत्र में आठ दशमलव सात प्रतिशत की वृद्धि इस तेजी के मुख्य वाहक बने हैं। कृषि क्षेत्र ने भी दो प्रतिशत की मामूली लेकिन सकारात्मक वृद्धि दर्ज की है। हालांकि निजी निवेश चक्र अभी पूरी तरह पटरी पर नहीं लौटा है और निर्यात मोर्चे पर वैश्विक मंदी का दबाव बरकरार है। रिजर्व बैंक ने मुद्रास्फीति को लक्ष्य दायरे में रखने के लिए सतर्क रुख अपनाए रखा है, जिससे आने वाली तिमाहियों में ब्याज दरों में कटौती की संभावना सीमित नजर आती है। कुल मिलाकर पहली तिमाही के ये मजबूत आंकड़े भारतीय अर्थव्यवस्था के लचीलेपन को रेखांकित करते हैं, लेकिन असमान विकास, रोजगार सृजन की धीमी रफ्तार और बाह्य क्षेत्र के जोखिम आगे की राह में चुनौती बने रहेंगे। सरकार के लिए असली परीक्षा इस वृद्धि को समावेशी और टिकाऊ बनाने की होगी, जबकि विपक्ष के लिए आर्थिक विमर्श को विश्वसनीय आंकड़ों के साथ जनता तक ले जाने की चुनौती है। आने वाले त्योहारी मौसम और कृषि उत्पादन पर मानसून का असर अगली तिमाही की दिशा तय करेंगे।