किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में आज से शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) का वार्षिक शिखर सम्मेलन प्रारंभ हो गया है। इस महत्वपूर्ण बहुपक्षीय मंच पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उपस्थिति भारत की क्षेत्रीय कूटनीति की प्राथमिकताओं को दर्शाती है। सम्मेलन के आरंभ में प्रधानमंत्री मोदी ने बिश्केक स्थित महात्मा गांधी की प्रतिमा पर पुष्पांजलि अर्पित कर उन्हें श्रद्धांजलि दी, जो भारत के सांस्कृतिक मूल्यों और वैश्विक शांति के प्रति प्रतिबद्धता का प्रतीक है। इस दो दिवसीय शिखर बैठक में सुरक्षा सहयोग, आतंकवाद विरोधी रणनीति, व्यापार व आर्थिक सहभागिता तथा संपर्क मार्गों के विकास जैसे प्रमुख मुद्दों पर गहन चर्चा होने की संभावना है। सम्मेलन के इतर प्रधानमंत्री मोदी की द्विपक्षीय वार्ताओं पर सबकी निगाहें टिकी हैं। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ उनकी निर्धारित मुलाकात को विशेष महत्व दिया जा रहा है, क्योंकि दोनों देश रक्षा, ऊर्जा और अंतरिक्ष क्षेत्र में रणनीतिक साझेदारी को नई ऊंचाई देना चाहते हैं। हालांकि सूत्रों के अनुसार चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ औपचारिक द्विपक्षीय बैठक का कार्यक्रम नहीं है, फिर भी अनौपचारिक संवाद की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। इसके अलावा ईरान के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान के साथ प्रधानमंत्री की भेंट भारत-ईरान संबंधों, विशेषकर चाबहार बंदरगाह परियोजना और अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे को गति दे सकती है। भारत के लिए एससीओ का महत्व लगातार बढ़ रहा है, क्योंकि यह संगठन मध्य एशिया तक भारत की पहुंच का प्रमुख माध्यम है। इस मंच के माध्यम से भारत क्षेत्रीय सुरक्षा संरचना में सक्रिय भागीदारी निभाते हुए आतंकवाद, कट्टरपंथ और मादक पदार्थों की तस्करी जैसी साझा चुनौतियों का मुकाबला करने की सामूहिक रणनीति तैयार करता है। साथ ही, यूरेशियन आर्थिक संघ और चीन की बेल्ट एंड रोड पहल के समानांतर भारत संपर्क मार्गों के वैकल्पिक ढांचे को प्रोत्साहित करता रहा है, जिससे क्षेत्र में संप्रभुता और पारदर्शिता आधारित विकास सुनिश्चित हो सके। शिखर सम्मेलन के एजेंडे में डिजिटल अर्थव्यवस्था, हरित ऊर्जा, खाद्य सुरक्षा और सांस्कृतिक आदान-प्रदान जैसे नए आयाम भी शामिल किए गए हैं। भारत इन क्षेत्रों में अपनी विशेषज्ञता और अनुभव साझा कर सहयोग का दायरा बढ़ाने का इच्छुक है। प्रधानमंत्री मोदी अपने संबोधन में सुधारित बहुपक्षवाद, नियम आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था और समावेशी विकास पर जोर दे सकते हैं, जो भारत की विदेश नीति के मूल सिद्धांत हैं। निष्कर्षतः, बिश्केक शिखर सम्मेलन भारत के लिए अपनी क्षेत्रीय कूटनीति को धार देने और वैश्विक मंच पर नेतृत्वकारी भूमिका स्थापित करने का महत्वपूर्ण अवसर है। द्विपक्षीय वार्ताओं के ठोस नतीजे और बहुपक्षीय घोषणापत्र में भारत की प्राथमिकताओं का समावेश इस सम्मेलन की सफलता के मानदंड होंगे। आने वाले दिनों में इन सहमतियों के क्रियान्वयन पर ही क्षेत्रीय स्थिरता और समृद्धि का भविष्य निर्भर करेगा।