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Breaking News: न्यूयॉर्क में मोहन भागवत का बड़ा बयान: 'मुसलमानों के बिना हिंदू नहीं रह सकते हिंदू', प्रवासी भारतीयों को 'कर्मभूमि' के प्रति वफादारी का संदेश
🕒 1 week ago

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने अमेरिका के न्यूयॉर्क में आयोजित एक कार्यक्रम में ऐसा बयान दिया है जिसने देश-विदेश में चर्चा का बाजार गर्म कर दिया है। संघ प्रमुख ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि हिंदू यह सोचते हैं कि मुसलमानों के लिए इस देश में कोई स्थान नहीं है, तो वे हिंदू कहलाने का अधिकार खो देते हैं। यह बयान उस समय आया है जब देश में सांप्रदायिक सौहार्द और समावेशी राष्ट्रवाद को लेकर बहस अपने चरम पर है। भागवत ने हिंदुत्व की अपनी परिभाषा को विस्तार देते हुए उसे संकीर्णता के दायरे से बाहर निकाला और वसुधैव कुटुंबकम की भारतीय अवधारणा को पुनः प्रतिष्ठित करने का प्रयास किया। कार्यक्रम में अपने संबोधन के दौरान मोहन भागवत ने संघ के दृष्टिकोण को स्पष्ट करते हुए कहा कि आरएसएस का सपना पूरी दुनिया को एक सूत्र में बांधकर देखना है। उन्होंने भारत की सनातन परंपरा का हवाला देते हुए कहा कि एकता और विविधता इस देश के डीएनए में निहित है। यह विविधता किसी थोपी हुई व्यवस्था का परिणाम नहीं, बल्कि हजारों वर्षों की सांस्कृतिक विकास यात्रा का स्वाभाविक परिणाम है। सरसंघचालक ने प्रवासी भारतीय समुदाय को संबोधित करते हुए उनसे आह्वान किया कि वे जिस देश में रहते हैं, वहां के प्रति पूरी निष्ठा और ईमानदारी से अपना कर्तव्य निभाएं। उन्होंने 'कर्मभूमि' की अवधारणा को समझाते हुए कहा कि अमेरिका में रह रहे भारतीयों को अमेरिका के प्रति सच्चे नागरिक की तरह व्यवहार करना चाहिए, साथ ही अपनी सांस्कृतिक जड़ों से भी जुड़े रहना चाहिए। हालांकि, भागवत के इन बयानों पर देश की राजनीति में तीखी प्रतिक्रिया भी देखने को मिली। राज्यसभा सांसद और वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने संघ प्रमुख पर कटाक्ष करते हुए कहा कि विदेश में तो वे उदारवादी और समावेशी बातें करते हैं, लेकिन देश के अंदरूनी मसलों पर उनकी चुप्पी कई सवाल खड़े करती है। सिब्बल ने इसे 'दोहरा मापदंड' करार देते हुए पूछा कि जो बातें वे न्यूयॉर्क में कह रहे हैं, वही बातें वे दिल्ली या नागपुर में क्यों नहीं दोहराते? इस आलोचना ने एक बार फिर संघ की कथनी और करनी के अंतर को लेकर बहस को हवा दे दी है। वहीं, संघ समर्थकों का तर्क है कि भागवत का संदेश सुसंगत है और वे लंबे समय से इसी विचारधारा की वकालत करते रहे हैं। प्रवासी भारतीयों के लिए भागवत का संदेश बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि यह उनकी दोहरी पहचान - सांस्कृतिक विरासत और वर्तमान नागरिकता - के बीच संतुलन स्थापित करने का मार्गदर्शन करता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि 'मातृभूमि' के प्रति प्रेम और 'कर्मभूमि' के प्रति कर्तव्यपरायणता में कोई विरोधाभास नहीं है। यह विचार गांधीजी के 'ट्रस्टीशिप' सिद्धांत और भारतीय दर्शन के 'निष्काम कर्मयोग' के अनुरूप है। न्यूयॉर्क का यह कार्यक्रम संघ के वैश्विक विस्तार और अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारतीय विचारधारा को प्रस्तुत करने की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। निष्कर्षतः, मोहन भागवत का न्यूयॉर्क संबोधन संघ की विचारधारा के उदार और समावेशी स्वरूप को विश्व पटल पर रखने का एक सुविचारित प्रयास प्रतीत होता है। मुसलमानों के प्रति स्वीकृति का उनका बयान हिंदुत्व की परिभाषा को पुनर्गढ़ने का प्रयास है, वहीं प्रवासी भारतीयों को दिया गया संदेश वैश्विक नागरिकता और सांस्कृतिक अस्मिता के सामंजस्य की बात करता है। हालांकि, घरेलू आलोचकों की नजर में इसकी वास्तविक परख तभी होगी जब ये सिद्धांत देश की आंतरिक नीतियों और सामाजिक व्यवहार में भी उतनी ही दृढ़ता से प्रतिबिंबित हों। दुनिया के सबसे बड़े स्वयंसेवी संगठन के मुखिया का यह बयान भविष्य में भारतीय समाज और राजनीति की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

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✍️ By Pradeep Yadav | 30 Aug 2026