नेपाल में आई भीषण बाढ़ और भूस्खलन की त्रासदी को तीन दिन बीत चुके हैं, लेकिन ईशा फाउंडेशन के 77 तीर्थयात्रियों का अब तक कोई सुराग नहीं मिल सका है। इस प्राकृतिक आपदा में मरने वालों की संख्या बढ़कर 626 हो गई है, जबकि सैकड़ों लोग अब भी लापता बताए जा रहे हैं। बचाव अभियान चौथे दिन भी जारी है, लेकिन खराब मौसम और दुर्गम पहाड़ी इलाके राहत कार्यों में बड़ी बाधा बन रहे हैं। नेपाल के विदेश मंत्री ने स्पष्ट किया है कि देश को तलाशी और बचाव अभियान के बजाय तकनीकी सहायता की अधिक आवश्यकता है। इस बीच, तमिलनाडु के 21 तीर्थयात्रियों का एक समूह चमत्कारिक रूप से सुरक्षित लौट आया है, जिन्होंने वहां के भयावह मंजर का आंखों देखा हाल बयान किया है। इन यात्रियों के अनुसार, अचानक आई बाढ़ और चट्टानों के खिसकने से उनके शिविर पूरी तरह तबाह हो गए थे। उन्होंने बताया कि पानी का बहाव इतना तेज था कि किसी को संभलने का मौका तक नहीं मिला। कई यात्री तो अपनी आंखों के सामने अपनों को बहते हुए देखने को मजबूर थे। इन बचे हुए लोगों की आपबीती इस त्रासदी की भयावहता को बयां करती है। वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि हिमनदों के पिघलने और भूस्खलन के कारण नई हिमनद झीलों का निर्माण हो रहा है, जिससे भविष्य में और भी विनाशकारी बाढ़ आने का खतरा बना हुआ है। द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार, हिम-चट्टान हिमस्खलन के स्रोत पर ताजा हिमनद झीलें बन रही हैं, जो निकट भविष्य में एक और बड़े खतरे का संकेत दे रही हैं। नेपाल सरकार ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से तकनीकी विशेषज्ञता, उपकरण और दीर्घकालिक पुनर्निर्माण में सहयोग की अपील की है। भारत सरकार भी स्थिति पर करीबी नजर रखे हुए है और नेपाल को हर संभव सहायता प्रदान कर रही है। भारतीय दूतावास लापता भारतीय नागरिकों का पता लगाने के लिए नेपाली अधिकारियों के साथ समन्वय कर रहा है। ईशा फाउंडेशन ने भी अपने स्तर पर खोज अभियान तेज कर दिया है और प्रभावित परिवारों को सहायता प्रदान कर रहा है। इस त्रासदी ने हिमालयी क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन के बढ़ते खतरों और आपदा प्रबंधन की तैयारियों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह त्रासदी हमें प्रकृति की विनाशकारी शक्ति और मानवीय जीवन की नाजुकता का कड़वा अहसास कराती है। जहां एक ओर बचाव कार्य युद्धस्तर पर जारी हैं, वहीं दूसरी ओर इस आपदा से सबक लेकर भविष्य के लिए बेहतर तैयारियों और जलवायु अनुकूलन रणनीतियों पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है। लापता लोगों के परिजनों की आंखें अब भी अपनों के लौटने की राह देख रही हैं, और पूरा देश उनके साथ इस दुख की घड़ी में खड़ा है।