कर्नाटक की राजनीति में शनिवार को उस समय बड़ा भूचाल आ गया जब वल्मीकि विकास निगम घोटाले में नाम आने के बाद राज्य के अनुसूचित जनजाति कल्याण मंत्री बी नागेंद्र ने मुख्यमंत्री सिद्धारमैया को अपना इस्तीफा सौंप दिया। इस्तीफा देने के तुरंत बाद मीडिया से बात करते समय नागेंद्र अपने आंसू नहीं रोक पाए और कैमरे के सामने ही फूट-फूटकर रोने लगे। यह घटनाक्रम तब सामने आया जब कर्नाटक हाईकोर्ट ने इस बहुचर्चित घोटाले की जांच सीबीआई को सौंपने के संकेत दिए, जिसके बाद सत्ताधारी कांग्रेस सरकार पर दबाव बढ़ गया था। नागेंद्र का इस्तीफा विपक्षी भाजपा के लिए बड़ी नैतिक जीत मानी जा रही है, जो लगातार इस मुद्दे पर सरकार को घेर रही थी। वल्मीकि विकास निगम में हुए कथित वित्तीय अनियमितताओं का यह मामला लगभग 187 करोड़ रुपये के गबन से जुड़ा बताया जा रहा है। आरोप है कि निगम के खातों से बड़ी रकम को अवैध तरीके से निजी खातों में स्थानांतरित किया गया। इस घोटाले की आंच मंत्री नागेंद्र तक पहुंचने के बाद भाजपा ने विधानसभा से लेकर सड़क तक जोरदार प्रदर्शन किया था। भाजपा का आरोप था कि नागेंद्र के संरक्षण में ही यह घोटाला हुआ और मुख्यमंत्री सिद्धारमैया अपने मंत्री को बचा रहे हैं। विपक्ष के बढ़ते दबाव और अदालत के कड़े रुख को देखते हुए आखिरकार नागेंद्र को पद छोड़ना पड़ा। दिलचस्प बात यह है कि बी नागेंद्र को दो साल में दूसरी बार मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा है और दोनों बार मुख्यमंत्री अलग-अलग थे। इससे पहले 2022 में तत्कालीन मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई की सरकार में भी उन्हें खनन घोटाले के आरोपों में पद छोड़ना पड़ा था। उस समय वे भाजपा में थे, लेकिन बाद में वे कांग्रेस में शामिल हो गए। इस्तीफा देते समय नागेंद्र ने भावुक होकर खुद को "मनुवादी ताकतों" का शिकार बताया और आरोप लगाया कि उन्हें दलित और आदिवासी होने की सजा दी जा रही है। उन्होंने इसे भाजपा के खिलाफ अपनी लड़ाई का हिस्सा करार देते हुए कहा कि वे निर्दोष साबित होकर फिर लौटेंगे। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने नागेंद्र का इस्तीफा स्वीकार करते हुए कहा कि सरकार भ्रष्टाचार के प्रति जीरो टॉलरेंस की नीति पर चल रही है और किसी भी दोषी को बख्शा नहीं जाएगा। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि नागेंद्र का इस्तीफा नैतिक आधार पर लिया गया है, ताकि जांच निष्पक्ष रूप से चल सके। वहीं, भाजपा ने इसे "देर आए दुरुस्त आए" बताते हुए पूरे मामले की सीबीआई जांच की मांग जारी रखी है। पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा ने कहा कि केवल एक मंत्री का इस्तीफा काफी नहीं है, मुख्यमंत्री को भी नैतिक जिम्मेदारी लेनी चाहिए। इस पूरे प्रकरण ने कर्नाटक की राजनीति में भ्रष्टाचार के मुद्दे को एक बार फिर केंद्र में ला दिया है। जहां एक ओर कांग्रेस सरकार इसे अपनी पारदर्शिता का प्रमाण बता रही है, वहीं विपक्ष इसे सरकार की विफलता के रूप में पेश कर रहा है। आगामी लोकसभा चुनाव को देखते हुए यह मुद्दा दोनों दलों के लिए अहम साबित हो सकता है। नागेंद्र का भावुक इस्तीफा और उनके द्वारा लगाए गए जातिगत भेदभाव के आरोपों ने इस मामले को एक नया आयाम दे दिया है, जिसकी गूंज आने वाले दिनों में कर्नाटक की सियासी फिजा में सुनाई देती रहेगी।