नेपाल में आई भीषण बाढ़ ने अब तक 538 लोगों की जान ले ली है, जबकि सैकड़ों लोग अभी भी लापता हैं। नेपाल-चीन सीमा क्षेत्र में 26-27 अगस्त को आई इस विनाशकारी बाढ़ ने पूरे क्षेत्र को तहस-नहस कर दिया है। अधिकारियों के अनुसार, बाढ़ का खतरा तब तक बना रहेगा जब तक बाढ़ प्रभावित क्षेत्र के ऊपर स्थित दो झीलें पूरी तरह से खाली नहीं हो जातीं। यह प्राकृतिक आपदा नेपाल के इतिहास की सबसे भयावह बाढ़ घटनाओं में से एक मानी जा रही है, जिसने न केवल नेपाल बल्कि पड़ोसी देशों को भी गहरे संकट में डाल दिया है। बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में राहत और बचाव कार्य युद्ध स्तर पर जारी हैं। नेपाली सेना, सशस्त्र पुलिस बल और स्थानीय स्वयंसेवक दिन-रात फंसे हुए लोगों को निकालने में लगे हुए हैं। लापता लोगों की सूची में भारतीय नागरिक, स्थानीय निवासी और विदेशी पर्यटक शामिल हैं। एनडीटीवी की रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय दूतावास लगातार नेपाली अधिकारियों के संपर्क में है और लापता भारतीयों का पता लगाने के लिए हर संभव प्रयास कर रहा है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इस त्रासदी ने ध्यान आकर्षित किया है - द गार्जियन की रिपोर्ट के अनुसार, कई देशों के नागरिक इस बाढ़ में मारे गए हैं या लापता हैं। सीएनएन की रिपोर्ट के मुताबिक, यह बाढ़ नेपाल-चीन सीमा क्षेत्र पर अचानक आई थी, जिससे बचाव के लिए समय ही नहीं मिल पाया। भारी बारिश के कारण नदियों का जलस्तर अचानक बढ़ गया और देखते ही देखते पूरे गांव बह गए। बाढ़ के पानी ने सड़कों, पुलों और संचार व्यवस्था को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया है, जिससे राहत कार्यों में भारी दिक्कत आ रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालय क्षेत्र में ऐसी चरम मौसम की घटनाएं बढ़ रही हैं। इस त्रासदी का असर भारत के बिहार राज्य पर भी पड़ा है। रेडिफ की रिपोर्ट के अनुसार, नेपाल से आने वाली नदियों में बाढ़ का पानी पहुंचने से बिहार के सीमावर्ती जिलों में बाढ़ का खतरा मंडरा रहा है। बिहार सरकार ने अलर्ट जारी किया है और निचले इलाकों में रहने वाले लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया जा रहा है। नेपाल में बांधों और जलाशयों की स्थिति पर भी कड़ी नजर रखी जा रही है, क्योंकि किसी भी बांध के टूटने से स्थिति और भयावह हो सकती है। नेपाल सरकार ने अंतरराष्ट्रीय सहायता की अपील की है और कई देशों ने राहत सामग्री भेजनी शुरू कर दी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन और अन्य अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां बीमारी फैलने की आशंका को देखते हुए चिकित्सा सहायता प्रदान कर रही हैं। इस त्रासदी ने एक बार फिर पहाड़ी क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे की कमजोरी और जलवायु परिवर्तन के खतरों को उजागर किया है। आने वाले दिनों में मौसम साफ रहने की उम्मीद है, जिससे राहत कार्यों में तेजी आएगी, लेकिन जान-माल का नुकसान भरपाई करना असंभव है।