अमेरिका और कनाडा के बीच व्यापार तनाव नए चरम पर पहुंच गया है, जिससे लगभग 900 अरब डॉलर का द्विपक्षीय व्यापार खतरे में पड़ गया है। पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी के बीच चल रहे वाकयुद्ध ने अब वास्तविक आर्थिक कार्रवाई का रूप ले लिया है। कनाडा ने अमेरिकी वस्तुओं पर 'डॉलर-के-बदले-डॉलर' के सिद्धांत पर जवाबी शुल्क लगाने की घोषणा की है, जो कुछ उत्पादों पर 50 प्रतिशत तक पहुंच सकते हैं। इस कदम से दोनों देशों के दशकों पुराने आर्थिक संबंधों में दरार पड़ने की आशंका गहरा गई है। कनाडा सरकार की ओर से जारी बयान के अनुसार, ये जवाबी शुल्क अमेरिका द्वारा कनाडाई इस्पात और एल्युमीनियम पर लगाए गए 25 प्रतिशत शुल्क के प्रत्युत्तर में लगाए गए हैं। प्रभावित अमेरिकी उत्पादों में स्टील, एल्युमीनियम, कृषि उत्पाद, मादक पेय, घरेलू उपकरण और टॉयलेट पेपर जैसी रोजमर्रा की वस्तुएं शामिल हैं। द गार्जियन की रिपोर्ट के अनुसार, इस व्यापार युद्ध का तत्काल असर अमेरिकी उपभोक्ताओं पर पड़ने लगा है, जहां टॉयलेट पेपर की कीमतों में भारी वृद्धि देखी जा रही है। कनाडा अमेरिका को लुगदी और कागज का सबसे बड़ा निर्यातक है, और नए शुल्कों से आपूर्ति श्रृंखला बाधित हो रही है। व्यापार युद्ध का असर उपभोक्ता व्यवहार पर भी स्पष्ट दिख रहा है। कनाडाई नागरिकों ने अमेरिकी उत्पादों का बड़े पैमाने पर बहिष्कार शुरू कर दिया है। सुपरमार्केट में अमेरिकी ब्रांडों की बिक्री में गिरावट आई है, जबकि पर्यटन उद्योग में भी अमेरिकी यात्रियों की संख्या घट रही है। सोशल मीडिया पर 'बाय कनाडियन' अभियान जोर पकड़ रहा है। एनडीटीवी की रिपोर्ट के अनुसार, कनाडाई उपभोक्ता सक्रिय रूप से अमेरिकी उत्पादों के विकल्प तलाश रहे हैं, जिससे अमेरिकी निर्यातकों को दीर्घकालिक नुकसान हो सकता है। वहीं, ट्रंप का दावा कि 'अमेरिका को कनाडा की जरूरत नहीं' आर्थिक तथ्यों से मेल नहीं खाता। द हिंदू के विश्लेषण के अनुसार, अमेरिका कनाडा को सबसे अधिक निर्यात करता है - 2023 में 352 अरब डॉलर का। कनाडा अमेरिका का सबसे बड़ा ऊर्जा आपूर्तिकर्ता है, जो कच्चे तेल का 60 प्रतिशत और बिजली का बड़ा हिस्सा प्रदान करता है। दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाएं गहरी आपूर्ति श्रृंखलाओं से जुड़ी हैं, विशेष रूप से ऑटोमोबाइल, एयरोस्पेस और कृषि क्षेत्रों में। किसी भी पक्ष द्वारा एकतरफा कार्रवाई दोनों को नुकसान पहुंचाएगी। विशेषज्ञों का मानना है कि इस व्यापार युद्ध का कोई विजेता नहीं होगा। विश्व व्यापार संगठन के नियमों के तहत दोनों देशों के पास विवाद निपटान के तंत्र मौजूद हैं, लेकिन राजनीतिक अहंकार कूटनीति पर हावी होता दिख रहा है। यदि तनाव बढ़ता रहा तो उत्तर अमेरिकी मुक्त व्यापार समझौते (यूएसएमसीए) की नींव हिल सकती है। दोनों देशों के नेताओं को समझना होगा कि संरक्षणवाद की नीति अंततः उपभोक्ताओं, श्रमिकों और व्यवसायों - सभी को नुकसान पहुंचाती है। वार्ता की मेज पर लौटना ही एकमात्र व्यावहारिक रास्ता है।