ईरान ने संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा थोपे गए आर्थिक युद्ध का मुकाबला करने के लिए आत्मनिर्भरता की रणनीति को अपना प्रमुख हथियार बनाने का संकल्प दोहराया है। ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियान ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि वाशिंगटन के नए प्रतिबंधों से तेहरान के संकल्प पर कोई असर नहीं पड़ेगा और देश अपनी आंतरिक क्षमताओं के बल पर आगे बढ़ता रहेगा। यह बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिका ने ईरान के तेल और वित्तीय क्षेत्र को निशाना बनाते हुए भारत स्थित चार कंपनियों और तीन भारतीय नागरिकों समेत कई नई पाबंदियों की घोषणा की है। ईरानी नेतृत्व का मानना है कि 'अधिकतम दबाव' की नीति विफल हो चुकी है और अब प्रतिरोधक अर्थव्यवस्था ही एकमात्र रास्ता है। अमेरिकी प्रतिबंधों की नवीनतम श्रृंखला को ईरान के खिलाफ आर्थिक 'डी-डे' की संज्ञा देते हुए अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने आशंका जताई है कि तेहरान इसकी प्रतिक्रिया 'भूकंप की तरह' दे सकता है। हालांकि, ईरानी अधिकारियों ने सैन्य टकराव के बजाय आर्थिक मोर्चे पर मजबूती को प्राथमिकता दी है। देश की मुद्रा रियाल में ऐतिहासिक गिरावट दर्ज की गई है, जहां एक अमेरिकी डॉलर की कीमत 20 लाख रियाल तक पहुंच गई है, जिससे आम जनजीवन और आयात प्रभावित हो रहा है। इसके बावजूद, सरकार घरेलू उत्पादन बढ़ाने, गैर-तेल निर्यात को प्रोत्साहित करने और पड़ोसी देशों के साथ वस्तु विनिमय तंत्र विकसित करने पर ध्यान केंद्रित कर रही है ताकि डॉलर पर निर्भरता खत्म की जा सके। भारतीय कंपनियों और नागरिकों पर लगे प्रतिबंधों ने क्षेत्रीय कूटनीति में एक नया आयाम जोड़ दिया है। भारत पारंपरिक रूप से ईरान का प्रमुख तेल खरीदार और चाबहार बंदरगाह परियोजना में साझेदार रहा है। अमेरिका की इस कार्रवाई को नई दिल्ली पर दबाव बनाने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है, ताकि वह तेहरान के साथ आर्थिक संबंधों को सीमित करे। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे भारत की 'रणनीतिक स्वायत्तता' की नीति की परीक्षा होगी। वहीं, ईरान ने भारत समेत अन्य मित्र देशों से अपील की है कि वे एकपक्षीय अमेरिकी प्रतिबंधों का पालन करने के बजाय अंतरराष्ट्रीय कानून और द्विपक्षीय समझौतों के आधार पर सहयोग जारी रखें। आर्थिक मोर्चे पर चुनौतियों के बावजूद, ईरान का राजनीतिक नेतृत्व एकजुटता प्रदर्शित कर रहा है। सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह खामेनेई ने 'प्रतिरोधक अर्थव्यवस्था' के मॉडल को तेजी से लागू करने का आदेश दिया है, जिसमें ज्ञान-आधारित कंपनियों, कृषि और खनन क्षेत्र में निवेश बढ़ाने पर जोर है। सरकार का दावा है कि प्रतिबंधों ने वास्तव में घरेलू नवाचार को गति दी है और आज ईरान कई महत्वपूर्ण तकनीकी क्षेत्रों में आत्मनिर्भर बन चुका है। इस रणनीति का उद्देश्य अर्थव्यवस्था को तेल राजस्व के चक्र से मुक्त कर एक विविध और लचीला ढांचा तैयार करना है जो बाहरी झटकों को सहन कर सके। निष्कर्षतः, अमेरिकी प्रतिबंधों की धार कुंद करने के लिए ईरान ने आत्मनिर्भरता और क्षेत्रीय सहयोग का जो दोहरा रास्ता चुना है, उसकी सफलता बहुत हद तक आंतरिक प्रबंधन की दक्षता और अंतरराष्ट्रीय भू-राजनीतिक समीकरणों पर निर्भर करेगी। जहां एक ओर मुद्रा अवमूल्यन और महंगाई जनता का धैर्य परख रही है, वहीं दूसरी ओर सरकार का दावा है कि संकट को अवसर में बदलने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। आने वाले महीने यह तय करेंगे कि क्या 'प्रतिरोधक अर्थव्यवस्था' का यह मॉडल विश्व के सामने एक नई मिसाल पेश कर पाता है या वैश्विक वित्तीय व्यवस्था से अलग-थलग पड़ने की कीमत ईरान को चुकानी पड़ेगी।