अमेरिका ने ईरान पर आर्थिक दबाव बढ़ाने के लिए प्रतिबंधों का दायरा और विस्तार कर दिया है, जिसकी जद में अब भारत भी आ गया है। ट्रंप प्रशासन के इस नए कदम से अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और व्यापार जगत में हलचल मच गई है। अमेरिकी वित्त मंत्रालय ने ईरान के पेट्रोकेमिकल और तेल क्षेत्र से जुड़े नेटवर्क को निशाना बनाते हुए भारत स्थित चार कंपनियों और तीन भारतीय नागरिकों पर प्रतिबंध लगा दिए हैं। इस कार्रवाई को अमेरिका की 'आर्थिक डी-डे' रणनीति का हिस्सा बताया जा रहा है, जिसका मकसद ईरान के राजस्व स्रोतों को पूरी तरह सुखा देना है। प्रतिबंधित की गई भारतीय कंपनियों पर आरोप है कि वे ईरानी पेट्रोकेमिकल उत्पादों की बिक्री और शिपमेंट में मदद कर ईरान की अर्थव्यवस्था को सहारा दे रही थीं। अमेरिकी विदेश विभाग के अनुसार, ये इकाइयां ईरान की सेना और रिवोल्यूशनरी गार्ड्स को वित्तीय मदद पहुंचाने वाले नेटवर्क का हिस्सा थीं। जिन तीन भारतीय नागरिकों को सूची में डाला गया है, उन पर प्रतिबंधों से बचने के लिए जटिल वित्तीय लेन-देन की योजनाएं बनाने का आरोप है। इस कार्रवाई के बाद इन कंपनियों और व्यक्तियों की अमेरिकी अधिकार क्षेत्र में आने वाली सभी संपत्तियां फ्रीज हो जाएंगी और कोई भी अमेरिकी नागरिक या कंपनी इनके साथ लेन-देन नहीं कर सकेगी। भारत के लिए यह स्थिति बेहद नाजुक है क्योंकि एक तरफ अमेरिका रणनीतिक साझेदार है तो दूसरी तरफ ईरान से ऊर्जा सुरक्षा और चाबहार बंदरगाह जैसे सामरिक हित जुड़े हैं। जानकारों का मानना है कि भारत सरकार को इस मुद्दे पर बेहद सधा हुआ रुख अपनाना होगा। नई दिल्ली को वॉशिंगटन को यह समझाना होगा कि चाबहार परियोजना अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच के लिए महत्वपूर्ण है, वहीं ईरान से तेल आयात कम करने की अमेरिकी मांग को भी संतुलित करना होगा। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आई हालिया नरमी इस बात का संकेत है कि बाजार अमेरिकी प्रतिबंधों के असर को पहले ही आंक चुका है, लेकिन अनिश्चितता बरकरार है। इस बीच, अमेरिका की इस आक्रामक नीति के सामने चीन सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरा है। चीन लगातार ईरानी तेल का सबसे बड़ा खरीदार बना हुआ है और उसने अमेरिकी प्रतिबंधों को मानने से इनकार कर दिया है। बीजिंग का तर्क है कि ये एकतरफा प्रतिबंध अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन हैं। ऐसे में देखना होगा कि क्या अमेरिका चीन की कंपनियों पर भी ऐसी ही सख्त कार्रवाई करेगा या फिर व्यापार युद्ध की आशंका में अपने कदम पीछे खींचेगा। वैश्विक ऊर्जा बाजार और भू-राजनीति के लिहाज से आने वाले कुछ महीने बेहद निर्णायक साबित होने वाले हैं। निष्कर्ष के तौर पर कहा जा सकता है कि अमेरिका की 'अधिकतम दबाव' नीति अब अपने चरम पर पहुंच गई है और इसके छींटे सहयोगी देशों पर भी पड़ने लगे हैं। भारत को अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखते हुए इस भू-राजनीतिक शतरंज की बिसात पर बहुत सोच-समझकर चाल चलनी होगी। भविष्य में द्विपक्षीय वार्ता और बहुपक्षीय मंचों पर इस मुद्दे का कूटनीतिक हल निकालना ही सभी पक्षों के हित में होगा।