सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को एक महत्वपूर्ण फैसले में पूर्व पत्रकार तरुण तेजपाल को 2013 के दुष्कर्म मामले में दो सप्ताह के भीतर सरेंडर करने का आदेश दिया है। न्यायमूर्ति बेला एम त्रिवेदी और न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता की पीठ ने तेजपाल की उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें उन्होंने सजा के खिलाफ अपील लंबित रहने तक सरेंडर से छूट की मांग की थी। अदालत ने स्पष्ट किया कि वह अपील पर सुनवाई से पहले सरेंडर के मुद्दे पर फैसला करेगी, लेकिन फिलहाल तेजपाल को निर्धारित समय सीमा के भीतर आत्मसमर्पण करना होगा। यह मामला नवंबर 2013 का है जब तहलका पत्रिका के संस्थापक संपादक तरुण तेजपाल पर उनकी एक जूनियर महिला सहकर्मी ने गोवा के एक फाइव स्टार होटल की लिफ्ट में यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया था। लंबी चली सुनवाई के बाद गोवा की एक सत्र अदालत ने मई 2021 में तेजपाल को भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत दोषी ठहराते हुए 10 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। इसके बाद तेजपाल ने बॉम्बे हाईकोर्ट की गोवा पीठ में अपील दायर की थी, लेकिन हाईकोर्ट ने उनकी सजा को बरकरार रखा। इसके खिलाफ तेजपाल ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था। सुनवाई के दौरान गोवा सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने तेजपाल की अपील की विचारणीयता पर सवाल उठाते हुए कहा कि उन्होंने हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देने में देरी की है। वहीं तेजपाल के वकील कपिल सिब्बल ने दलील दी कि उनके मुवक्किल को जमानत पर रहने की अनुमति दी जाए क्योंकि अपील में उठाए गए मुद्दों पर विचार करने की आवश्यकता है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद तेजपाल को कोई अंतरिम राहत देने से इनकार कर दिया और उन्हें दो सप्ताह के भीतर सरेंडर करने का निर्देश जारी किया। इस फैसले को कानूनी विशेषज्ञों ने महत्वपूर्ण माना है क्योंकि यह दर्शाता है कि अदालतें यौन उत्पीड़न के मामलों में दोषियों को अपील लंबित रहने के दौरान भी जेल भेजने को तैयार हैं। तेजपाल के मामले में यह भी उल्लेखनीय है कि उन्होंने अपनी दोषसिद्धि और सजा दोनों को चुनौती दी है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने प्रथम दृष्टया पाया कि सरेंडर टालने का कोई आधार नहीं बनता। गोवा सरकार ने इस फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि यह न्याय की जीत है और पीड़िता के साहस की पुष्टि करता है। अब तरुण तेजपाल को 10 साल की सजा काटने के लिए जेल जाना होगा। सुप्रीम कोर्ट उनकी अपील पर बाद में सुनवाई करेगा, लेकिन तब तक उन्हें हिरासत में रहना होगा। इस फैसले ने एक बार फिर यह संदेश दिया है कि कानून से ऊपर कोई नहीं है और प्रभावशाली व्यक्तियों को भी अपने अपराधों का परिणाम भुगतना पड़ता है। पीड़िता और महिला अधिकार कार्यकर्ताओं ने इस निर्णय को साहसिक कदम बताते हुए न्यायपालिका के प्रति आभार व्यक्त किया है।