पश्चिम एशिया की भू-राजनीति में एक बड़े घटनाक्रम के तहत सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान के नेतृत्व वाले 'मक्का समझौते' में ईरान को शामिल होने का न्योता दिए जाने की खबरें सामने आई हैं। यह कदम उस वक्त उठाया गया है जब सऊदी अरब और ईरान के बीच लंबे समय से चले आ रहे तनाव के बावजूद हाल के महीनों में राजनयिक संबंधों की बहाली की प्रक्रिया चल रही है। वहीं, यमन के हूती विद्रोहियों के साथ सऊदी अरब की तनातनी भी इस क्षेत्र की शांति के लिए एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। ऐसे में इस सैन्य और रणनीतिक गठजोड़ में ईरान को आमंत्रित करना क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को साधने की एक महत्वाकांक्षी कोशिश मानी जा रही है। रिपोर्ट्स के अनुसार, मक्का समझौता मुख्य रूप से इस्लामी दुनिया के प्रमुख देशों के बीच रक्षा सहयोग और सुरक्षा सहयोग को मजबूत करने के उद्देश्य से प्रस्तावित है। सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान इस पहल के प्रमुख स्तंभ हैं, जबकि अब बांग्लादेश ने भी इसमें शामिल होने की इच्छा जताई है। बांग्लादेश के मंत्रियों ने इस गठबंधन को क्षेत्रीय स्थिरता के लिए सकारात्मक बताते हुए सहमति के संकेत दिए हैं। जानकारों का मानना है कि यदि ईरान इस समझौते का हिस्सा बनता है तो यह सुन्नी बहुल सऊदी अरब और शिया बहुल ईरान के बीच ऐतिहासिक प्रतिद्वंद्वता को खत्म करने की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम साबित हो सकता है। साथ ही, हूती मुद्दे पर भी साझा रणनीति बनाने में मदद मिल सकती है। हालांकि, इस उभरते हुए समीकरण पर भारत की पैनी नजर है। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने इस प्रस्तावित रक्षा समझौते को लेकर सवालिया निशान खड़े किए हैं। उन्होंने इसकी व्यावहारिकता पर संदेह जताते हुए पूछा है कि जब इन देशों के अपने-अपने क्षेत्र में सक्रिय सैन्य परिस्थितियां मौजूद हैं, तब इस तरह के समझौते ने जमीन पर क्या ठोस परिणाम दिए हैं। भारत का यह रुख उसकी उस नीति के अनुरूप है जिसमें वह पश्चिम एशिया के सभी देशों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखने पर जोर देता है और किसी भी ऐसे गठजोड़ से दूरी रखता है जो क्षेत्रीय ध्रुवीकरण को बढ़ावा दे। विश्लेषकों का कहना है कि मक्का समझौते की 'काइनेटिक क्षमता' यानी सैन्य कार्रवाई की संभावना अभी सैद्धांतिक अधिक है। तुर्की की नाटो सदस्यता, पाकिस्तान की आंतरिक सुरक्षा चुनौतियाँ और सऊदी-ईरान अविश्वास की गहरी जड़ें इस गठबंधन की राह में बड़ी बाधाएं हैं। फिर भी, अगर यह पहल परवान चढ़ती है तो यह मुस्लिम दुनिया के दो बड़े ध्रुवों को एक मंच पर लाने का दुर्लभ उदाहरण बनेगी। बांग्लादेश का झुकाव इस गठबंधन को दक्षिण एशिया तक विस्तार देने का संकेत देता है, जिससे हिंद महासागर क्षेत्र की सुरक्षा संरचना पर भी असर पड़ सकता है। निष्कर्षतः, ईरान को मक्का समझौते में आमंत्रित करना क्षेत्रीय कूटनीति में एक नए अध्याय की शुरुआत हो सकती है, बशर्ते सभी पक्ष अपने मतभेदों को किनारे रखकर साझा सुरक्षा हितों को प्राथमिकता दें। भारत समेत विश्व की प्रमुख शक्तियां इस घटनाक्रम को बारीकी से देख रही हैं, क्योंकि इसका असर वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा, समुद्री मार्गों की सुरक्षा और आतंकवाद विरोधी प्रयासों पर पड़ना तय है। आने वाले दिन यह तय करेंगे कि यह पहल महज एक कूटनीतिक संकेत बनकर रह जाती है या फिर ठोस क्षेत्रीय सुरक्षा ढांचे का आधार बनती है।