लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के प्रमुख और केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर चल रहे आरक्षण विरोधी प्रदर्शन के बीच बड़ा बयान देते हुए स्पष्ट किया कि आरक्षण कोई दान या खैरात नहीं, बल्कि संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकार है। उन्होंने कहा कि बाबासाहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर ने संविधान में सामाजिक न्याय और समानता सुनिश्चित करने के लिए आरक्षण का प्रावधान किया था, जिसे किसी भी परिस्थिति में कमजोर नहीं किया जा सकता। चिराग पासवान ने प्रदर्शनकारियों से अपील की कि वे अपनी मांगों को व्यवस्थित और संवैधानिक ढंग से सरकार के सामने रखें, ताकि उन पर सार्थक संवाद हो सके। दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर पर आरक्षण सुधार की मांग को लेकर प्रदर्शन की अनुमति देने से इनकार कर दिया है, जिसके बाद प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच तनाव की स्थिति बनी हुई है। इस बीच चिराग पासवान ने कहा कि सरकार बातचीत के लिए तैयार है, बशर्ते मांगें व्यवस्थित तरीके से प्रस्तुत की जाएं। उन्होंने जोर देकर कहा कि लोकतंत्र में संवाद ही समस्याओं के समाधान का एकमात्र रास्ता है। चिराग ने यह भी स्पष्ट किया कि आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा की मांग करना अलग बात है, लेकिन इसे पूरी तरह खत्म करने की बात संविधान की मूल भावना के खिलाफ है। विभिन्न मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, चिराग पासवान ने कहा कि आरक्षण समाज के वंचित वर्गों को मुख्यधारा में लाने का एक सशक्त माध्यम है। उन्होंने आगाह किया कि इसे राजनीतिक मुद्दा बनाकर सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने की कोशिश नहीं की जानी चाहिए। केंद्रीय मंत्री ने कहा कि उनकी पार्टी सामाजिक न्याय के लिए प्रतिबद्ध है और आरक्षण को किसी भी कीमत पर कमजोर नहीं होने देगी। उन्होंने प्रदर्शनकारियों से संयम बरतने और कानून के दायरे में रहकर अपनी बात रखने की अपील की। इस मुद्दे पर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी तेज हो गई हैं। विपक्षी दलों ने चिराग पासवान के बयान का स्वागत करते हुए कहा कि यह संविधान और सामाजिक न्याय की रक्षा में महत्वपूर्ण कदम है। वहीं, प्रदर्शनकारी संगठनों का कहना है कि वे शांतिपूर्ण ढंग से अपनी मांगें रखना चाहते हैं, लेकिन पुलिस की अनुमति न मिलने से उनके लोकतांत्रिक अधिकार का हनन हो रहा है। दिल्ली पुलिस का कहना है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए अनुमति नहीं दी गई है। निष्कर्ष के तौर पर कहा जा सकता है कि चिराग पासवान का यह बयान आरक्षण के मुद्दे पर स्पष्ट रुख दर्शाता है। उन्होंने संवैधानिक मर्यादा का पालन करते हुए संवाद का रास्ता सुझाया है, जो लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए सकारात्मक संकेत है। अब देखना होगा कि सरकार और प्रदर्शनकारी इस मुद्दे पर कितनी गंभीरता से संवाद करते हैं और सामाजिक न्याय की दिशा में क्या ठोस कदम उठाए जाते हैं।