भारतीय जनता पार्टी ने 'वंदे मातरम्' को लेकर एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित करते हुए कांग्रेस के उस निर्णय की कड़ी निंदा की है जिसमें पार्टी ने राष्ट्रगीत के केवल दो छंद गाने का फैसला लिया था। भाजपा ने इसे राष्ट्रगीत का अपमान बताते हुए कहा है कि 'वंदे मातरम्' भारत की अस्मिता और स्वतंत्रता संग्राम का प्रतीक है, इसके किसी भी भाग को छोड़ना स्वीकार्य नहीं है। पार्टी ने इस मुद्दे पर देशव्यापी विरोध प्रदर्शन करने का भी ऐलान किया है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने इस अवसर पर बोलते हुए कहा कि आजादी के बाद 'वंदे मातरम्' को कभी भी पूर्ण रूप से स्वीकार नहीं किया गया। उन्होंने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि केवल दो छंद गाकर पार्टी ने राष्ट्रगीत का खंडन किया है। शाह ने जोर देकर कहा कि भाजपा राष्ट्रगीत के पूर्ण स्वरूप के साथ खड़ी है और इसमें किसी भी प्रकार के समझौते का सवाल ही नहीं उठता। पार्टी ने अपने प्रस्ताव में स्पष्ट किया कि 'वंदे मातरम्' के सभी छंद राष्ट्रभक्ति की भावना से ओत-प्रोत हैं। दूसरी ओर, कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल ने भाजपा के आरोपों का खंडन करते हुए कहा कि वास्तविक राष्ट्रविरोधी गतिविधि वे लोग कर रहे हैं जो समाज को बांटने का काम कर रहे हैं। सिब्बल ने ऐतिहासिक तथ्यों का हवाला देते हुए बताया कि रवींद्रनाथ टैगोर, जिन्होंने 'वंदे मातरम्' को सबसे पहले लोकप्रिय बनाया था, वे स्वयं इसके संपूर्ण गायन के पक्ष में नहीं थे। टैगोर का मानना था कि गीत के कुछ छंद विशेष समुदाय की भावनाओं को आहत कर सकते हैं, इसलिए उन्होंने केवल पहले दो छंदों के गायन का समर्थन किया था। इतिहासकारों के अनुसार, 'वंदे मातरम्' बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित उपन्यास 'आनंदमठ' का हिस्सा है। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान यह गीत क्रांतिकारियों का प्रेरणास्रोत बना। 1937 में कांग्रेस कार्यसमिति ने इसके पहले दो छंदों को राष्ट्रगीत के रूप में अपनाने का निर्णय लिया था। संविधान सभा में भी इस पर विस्तृत चर्चा हुई थी और अंततः जनवरी 1950 में डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने इसके पहले दो छंदों को राष्ट्रगीत का दर्जा दिया था। इस विवाद ने एक बार फिर राष्ट्रगीत की व्याख्या और उसके राजनीतिक उपयोग को लेकर बहस छेड़ दी है। भाजपा जहां इसे राष्ट्रवाद की कसौटी बना रही है, वहीं विपक्ष इसे सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का हथियार बता रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि 'वंदे मातरम्' भारत की साझी विरासत है और इस पर राजनीति करने के बजाय इसके ऐतिहासिक महत्व को समझने की आवश्यकता है। सभी दलों को मिलकर यह सुनिश्चित करना चाहिए कि राष्ट्रगीत राष्ट्रीय एकता का प्रतीक बना रहे, न कि विभाजन का कारण बने।