विश्व मौसम विज्ञान संगठन और ब्रिटेन के मौसम कार्यालय ने चेतावनी जारी की है कि इस वर्ष का अल नीनो पिछली एक सदी से अधिक समय में सबसे शक्तिशाली हो सकता है। मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार, प्रशांत महासागर के विषुवत रेखीय क्षेत्र में समुद्र की सतह का तापमान असामान्य रूप से बढ़ रहा है, जो वैश्विक मौसम पैटर्न को बुरी तरह प्रभावित करेगा। इस घटना को 'जीवित स्मृति में सबसे तीव्र' बताते हुए विशेषज्ञों ने कहा कि इसके कारण विश्व भर में तापमान रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच सकता है और चरम मौसमी घटनाओं की आवृत्ति में भारी वृद्धि होगी। भारत के लिए यह खबर विशेष रूप से चिंताजनक है क्योंकि कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था पर दोहरी मार पड़ने की आशंका है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के अनुसार, अल नीनो के प्रभाव से मानसून की बारिश में 10-15 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है, जिससे खरीफ फसलों की बुआई और उत्पादन प्रभावित होगा। इसके अलावा, रबी सीजन में भी सिंचाई के लिए जल उपलब्धता कम होने से गेहूं, दलहन और तिलहन जैसी प्रमुख फसलों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। कृषि मंत्रालय ने पहले ही राज्यों को सूखा प्रबंधन योजनाएं तैयार करने का निर्देश दिया है। वैश्विक स्तर पर इस अल नीनो के प्रभाव पहले से ही दिखाई दे रहे हैं। ऑस्ट्रेलिया में भयंकर सूखा और झाड़ियों में आग, दक्षिण अमेरिका में भारी बाढ़, और उत्तरी अमेरिका में असामान्य गर्मी की लहरें दर्ज की गई हैं। यूरोप में शरद ऋतु में अधिक वर्षा और तूफान की भविष्यवाणी की गई है। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन ने वैश्विक खाद्य सुरक्षा पर गंभीर खतरे की चेतावनी देते हुए कहा कि अनाज की कीमतों में उछाल आ सकता है, जिससे विकासशील देशों में गरीब आबादी सबसे अधिक प्रभावित होगी। भारत सरकार ने स्थिति से निपटने के लिए बहुस्तरीय रणनीति अपनाई है। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना का दायरा बढ़ाया जा रहा है, जबकि सिंचाई बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के लिए अतिरिक्त धनराशि आवंटित की गई है। कृषि वैज्ञानिक सूखा-सहिष्णु फसल किस्मों के बीज किसानों को उपलब्ध करा रहे हैं। इसके अलावा, जल संरक्षण और भूजल पुनर्भरण परियोजनाओं को युद्ध स्तर पर चलाया जा रहा है। मौसम आधारित फसल सलाह सेवाओं को डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से किसानों तक पहुंचाया जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह अल नीनो घटना जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभावों का स्पष्ट संकेत है। जहां तात्कालिक उपाय आवश्यक हैं, वहीं दीर्घकालिक समाधान के लिए जलवायु-स्मार्ट कृषि, नवीकरणीय ऊर्जा को अपनाने और कार्बन उत्सर्जन में कटौती पर जोर देना होगा। भारत जैसे देशों के लिए, जहां करोड़ों लोग कृषि पर निर्भर हैं, यह चुनौती अवसर में बदल सकती है यदि हम सतत कृषि पद्धतियों और जलवायु-लचीला बुनियादी ढांचे में निवेश करें। आने वाले महीने निर्णायक होंगे जब मानसून की वास्तविक प्रगति और अल नीनो की तीव्रता का सही आकलन होगा।