नई दिल्ली स्थित जंतर-मंतर पर रविवार को 'आरक्षण हटाओ आंदोलन' के बैनर तले हजारों प्रदर्शनकारियों ने विशाल जमावड़ा लगाया। इस प्रदर्शन में देशभर के विभिन्न राज्यों से आए युवा, छात्र और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भाग लिया। प्रदर्शनकारियों की मुख्य मांग जाति आधारित आरक्षण व्यवस्था को पूरी तरह समाप्त कर आर्थिक आधार पर आरक्षण लागू करने की है। भीड़ की भारी तादाद को देखते हुए दिल्ली पुलिस ने सुरक्षा के अभूतपूर्व इंतजाम किए थे, जिसमें रैपिड एक्शन फोर्स (आरएएफ) की तैनाती और ड्रोन से निगरानी शामिल थी। प्रदर्शन स्थल के आसपास के मेट्रो स्टेशनों पर भी आवाजाही प्रतिबंधित रही। प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि वर्तमान आरक्षण व्यवस्था का लाभ वास्तविक जरूरतमंदों के बजाय संपन्न वर्ग उठा रहा है। उन्होंने 'धनी को आरक्षण नहीं' के नारे लगाते हुए मांग की कि आरक्षण का आधार जाति नहीं, बल्कि आर्थिक स्थिति होनी चाहिए। कई वक्ताओं ने यूजीसी के नए मानदंडों और कोटा सुधारों पर भी सवाल उठाए। प्रदर्शन के दौरान कुछ उत्तेजित प्रदर्शनकारियों ने बैरिकेड तोड़ने का प्रयास किया, जिसके बाद पुलिस ने हल्का बल प्रयोग करते हुए कई लोगों को हिरासत में ले लिया। हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, पुलिस ने एहतियातन करीब 50 प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया, जिन्हें बाद में रिहा कर दिया गया। द हिंदू और इंडिया टुडे की रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह प्रदर्शन कई सामाजिक संगठनों के संयुक्त मोर्चे द्वारा आयोजित किया गया था। आयोजकों ने दावा किया कि इस आंदोलन में 20 हजार से अधिक लोग शामिल हुए, जबकि पुलिस का अनुमान 8-10 हजार का है। प्रदर्शनकारियों ने प्रधानमंत्री कार्यालय और संसद तक मार्च निकालने की योजना बनाई थी, लेकिन पुलिस ने इसकी अनुमति नहीं दी। द प्रिंट की रिपोर्ट के अनुसार, प्रदर्शन में शामिल कई युवाओं का कहना था कि आरक्षण के कारण प्रतिभाशाली छात्रों को नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में प्रवेश नहीं मिल पाता, जबकि आरक्षित वर्ग के संपन्न परिवारों के बच्चे इसका बार-बार लाभ लेते हैं। सरकार की ओर से अभी तक इस प्रदर्शन पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इस मुद्दे पर चर्चा तेज हो गई है। विपक्षी दलों ने प्रदर्शनकारियों की मांगों पर विचार करने की बात कही है, जबकि सत्ताधारी दल के नेताओं ने इसे विपक्ष द्वारा प्रायोजित आंदोलन करार दिया है। सामाजिक न्याय मंत्रालय के सूत्रों का कहना है कि सरकार आरक्षण नीति की समीक्षा के लिए कोई समिति गठित करने पर विचार कर सकती है। हालांकि, संविधान विशेषज्ञों का मानना है कि आरक्षण व्यवस्था में मूलभूत परिवर्तन के लिए संविधान संशोधन की आवश्यकता होगी, जो एक लंबी और जटिल प्रक्रिया है। इस विशाल प्रदर्शन ने एक बार फिर आरक्षण नीति पर राष्ट्रीय बहस को तेज कर दिया है। जहां एक ओर प्रदर्शनकारी इसे समाप्त कर आर्थिक आधार पर आरक्षण की मांग कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर दलित, आदिवासी और पिछड़े वर्ग के संगठन इसे संवैधानिक अधिकार बताकर किसी भी बदलाव का विरोध कर रहे हैं। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर संसद से लेकर सड़क तक गरमागरम बहस देखने को मिल सकती है। सरकार के लिए चुनौती होगी कि वह सामाजिक न्याय और मेरिट के बीच संतुलन बनाते हुए ऐसा समाधान निकाले जो सभी वर्गों को स्वीकार्य हो।