ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान ने एक बार फिर अपनी विदेश नीति को लेकर कड़ा रुख अपनाते हुए कहा है कि जो लोग दुश्मन को आमंत्रित करते हैं, वे सच्चे ईरानी नहीं हो सकते। इस बयान के माध्यम से उन्होंने घरेलू विरोधियों और विदेशी हस्तक्षेप के समर्थकों को स्पष्ट संदेश दिया है कि ईरान की संप्रभुता और राष्ट्रीय हितों से कोई समझौता नहीं किया जाएगा। राष्ट्रपति के इस बयान को पश्चिम एशिया के वर्तमान तनावपूर्ण माहौल में बेहद अहम माना जा रहा है, जहां ईरान और अमेरिका के बीच तनाव चरम पर है। राष्ट्रपति पेज़ेश्कियान ने अपनी हालिया टिप्पणी में यह भी कहा कि अमेरिका के साथ चल रहे संघर्ष को अब समाप्त कर देना चाहिए, जबकि ईरान मजबूत स्थिति में है। उन्होंने दावा किया कि विश्व समुदाय अब यह स्वीकार करने लगा है कि ईरान ने अमेरिका के सामने विजय प्राप्त की है। इस बयान के जरिए उन्होंने न केवल अपनी घरेलू जनता का मनोबल बढ़ाने का प्रयास किया है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर ईरान की बढ़ती ताकत का संकेत भी दिया है। ब्लूमबर्ग और एनडीटीवी जैसी अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने भी उनके इस बयान को प्रमुखता से प्रकाशित किया है। ईरानी राष्ट्रपति का यह रुख ऐसे समय में सामने आया है जब पश्चिम एशिया में इजराइल, ईरान और अमेरिका के बीच तनाव लगातार बढ़ रहा है। पेज़ेश्कियान ने स्पष्ट किया कि ईरान युद्ध नहीं चाहता, लेकिन अपनी रक्षा के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार है। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से आग्रह किया कि वह क्षेत्र में शांति स्थापित करने के लिए ईरान के रुख का समर्थन करे। इस बयान को ईरान की परमाणु वार्ता और प्रतिबंधों से राहत पाने की कूटनीतिक कोशिशों के साथ भी जोड़कर देखा जा रहा है। विश्लेषकों का मानना है कि पेज़ेश्कियान के ये बयान ईरान की नई सरकार की विदेश नीति की दिशा तय करेंगे। जहां एक ओर वे घरेलू एकता को मजबूत करने के लिए राष्ट्रवादी भाषा का प्रयोग कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर अंतरराष्ट्रीय दबाव को कम करने के लिए वार्ता का रास्ता भी खुला रखना चाहते हैं। जेरूसलम पोस्ट और टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्टों के अनुसार, क्षेत्रीय शक्तियां ईरान के इस नए रुख को सावधानीपूर्वक देख रही हैं। निष्कर्षतः, राष्ट्रपति पेज़ेश्कियान के बयान ईरान की वर्तमान नीति का आईना हैं - दृढ़ता के साथ संवाद की इच्छा। उन्होंने स्पष्ट कर दिया है कि ईरान न तो बाहरी दबाव में झुकेगा और न ही आंतरिक विभाजन को सहन करेगा। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि उनकी यह नीति पश्चिम एशिया के भू-राजनीतिक समीकरणों को कैसे प्रभावित करती है और क्या अमेरिका के साथ तनाव कम करने की दिशा में कोई ठोस प्रगति होती है।