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Breaking News: वंदे मातरम विवाद: कांग्रेस के दो पद गाने के फैसले पर भाजपा का तीखा हमला, शाह ने लगाया तुष्टीकरण का आरोप
🕒 2 weeks ago

वंदे मातरम को लेकर छिड़ा सियासी संग्राम थमने का नाम नहीं ले रहा है। कांग्रेस द्वारा यह फैसला लिया गया कि वह केवल वंदे मातरम के पहले दो पद ही गाएगी, जिसके बाद भारतीय जनता पार्टी ने इसे बड़ा मुद्दा बना लिया है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कांग्रेस पर सीधा हमला बोलते हुए इसे तुष्टीकरण की राजनीति करार दिया और जनता से कांग्रेस के खिलाफ आवाज उठाने का आह्वान किया। शाह ने कहा कि वंदे मातरम राष्ट्रीय गीत है और इसका पूरा गायन न करना राष्ट्रभक्ति का अपमान है। इस विवाद की पृष्ठभूमि में वंदे मातरम के उन चार पदों का उल्लेख है जिनमें हिंदू देवी-देवताओं का जिक्र आता है, जिसे कुछ मुस्लिम संगठन और नेता गैर-इस्लामिक मानते रहे हैं। कांग्रेस के इस रुख पर पार्टी के अंदर भी बेचैनी देखने को मिल रही है। वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल ने अमित शाह पर पलटवार करते हुए पूछा कि क्या नरेंद्र मोदी ने गुजरात के मुख्यमंत्री रहते और अटल बिहारी वाजपेयी ने प्रधानमंत्री रहते वंदे मातरम का पूर्ण गायन किया था? सिब्बल का तर्क है कि भाजपा इस मुद्दे को बेवजह तूल देकर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करना चाहती है। पार्टी के कुछ रणनीतिकारों का मानना है कि इस विवाद में पड़कर कांग्रेस ने भाजपा के राष्ट्रवादी नैरेटिव को मजबूती दे दी है, जिससे बचा जा सकता था। इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार, कांग्रेस खेमे में इस बात को लेकर असहजता है कि यह स्टैंड भाजपा के हाथों में एक हथियार बन गया है। इतिहास के पन्नों को पलटें तो वंदे मातरम बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित 'आनंदमठ' उपन्यास का हिस्सा है। इसके पहले दो पद 'सुजलां सुफलां मलयजशीतलाम' और 'शुभ्र ज्योत्स्ना पुलकित यामिनीम' मातृभूमि की वंदना करते हैं और इनमें किसी विशिष्ट देवता का नाम नहीं है। लेकिन आगे के पदों में 'तुम्हीं दुर्गा, तुम्हीं कमला' और 'वंदे मातरम' के साथ मां काली, लक्ष्मी, सरस्वती का आह्वान आता है। 1937 में कांग्रेस कार्यसमिति ने जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में एक उपसमिति बनाई थी जिसमें मौलाना आजाद शामिल थे। इस समिति ने सिफारिश की थी कि केवल पहले दो पद ही राष्ट्रीय गीत के रूप में अपनाए जाएं, जिसे बाद में राजेंद्र प्रसाद ने 1950 में संविधान सभा में औपचारिक मान्यता दी। भाजपा इस ऐतिहासिक तथ्य को नकारते हुए इसे हिंदू भावनाओं से जोड़ रही है। अमित शाह ने अपने भाषणों में बार-बार दोहराया कि कांग्रेस वोट बैंक की खातिर राष्ट्रीय प्रतीकों का अपमान करती आई है। टेलीग्राफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, शाह इस विवाद के जरिए भाजपा के कोर राष्ट्रवादी वोट बैंक को गोलबंद करने का प्रयास कर रहे हैं। वहीं टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक, शाह ने कार्यकर्ताओं से कहा कि वे घर-घर जाकर लोगों को बताएं कि कांग्रेस वंदे मातरम का पूरा गायन क्यों नहीं करना चाहती। इस राजनीतिक रस्साकशी में संविधान सभा की बहसों और ऐतिहासिक सहमतियों को दरकिनार कर दिया गया है। निष्कर्षतः, वंदे मातरम का यह विवाद महज गीत के पदों तक सीमित न रहकर भारतीय राजनीति की उस गहरी खाई को उजागर करता है जहां इतिहास, पहचान और राष्ट्रवाद की व्याख्याएं टकराती हैं। कांग्रेस का तर्क संवैधानिक सहमति और सांप्रदायिक सौहार्द की ऐतिहासिक विरासत पर टिका है, तो भाजपा का हमला सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के अपने ब्रांड को धार देने पर केंद्रित है। जनता के सामने असल सवाल यह है कि क्या राष्ट्रीय प्रतीकों को राजनीतिक हथियार बनाना उचित है, या फिर संविधान निर्माताओं की दूरदर्शी सहमति का सम्मान करते हुए इन्हें विवाद से ऊपर रखा जाना चाहिए। आने वाले चुनावों में यह मुद्दा किस करवट बैठेगा, यह देखना शेष है।

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✍️ By Pradeep Yadav | 21 Aug 2026