केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में हुई दक्षिणी क्षेत्रीय परिषद की बैठक में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन, कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार और आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू एक मंच पर नजर आए। यह बैठक दक्षिणी राज्यों के बीच सहयोग और विकास के मुद्दों पर चर्चा के लिए बुलाई गई थी। गृह मंत्री ने इस अवसर पर दक्षिणी राज्यों के विकास की सराहना करते हुए तीन स्तंभों - बुनियादी ढांचा, मानव पूंजी और सुशासन को प्रगति का आधार बताया। बैठक में राज्यों के बीच लंबित विवादों को बातचीत के जरिए सुलझाने पर जोर दिया गया। बैठक के दौरान तमिलनाडु के मुख्यमंत्री स्टालिन ने नीट परीक्षा को खत्म करने, परिसीमन प्रक्रिया में दक्षिणी राज्यों के हितों की रक्षा और कावेरी जल विवाद के स्थायी समाधान की मांग रखी। उन्होंने कहा कि नीट ग्रामीण और गरीब छात्रों के लिए बाधा बन रहा है और राज्यों को चिकित्सा शिक्षा में अपने नियम बनाने का अधिकार मिलना चाहिए। कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने कावेरी जल विवाद पर बोलते हुए कहा कि पानी हमें जोड़ना चाहिए, बांटना नहीं। उन्होंने पड़ोसी राज्यों के साथ सौहार्दपूर्ण संबंधों पर जोर देते हुए जल बंटवारे के लिए व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाने की बात कही। आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने राज्य के विशेष दर्जे की मांग दोहराते हुए केंद्रीय सहायता बढ़ाने का आग्रह किया। उन्होंने पोलावरम परियोजना के लिए धन आवंटन और नई राजधानी अमरावती के विकास में केंद्र के सहयोग की मांग की। गृह मंत्री अमित शाह ने सभी मुख्यमंत्रियों को आश्वासन दिया कि केंद्र सरकार राज्यों की जायज मांगों पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करेगी। उन्होंने अंतर्राज्यीय विवादों के समाधान के लिए संस्थागत तंत्र को मजबूत बनाने पर बल दिया। बैठक में यह भी निर्णय लिया गया कि अगली दक्षिणी क्षेत्रीय परिषद की बैठक तेलंगाना में आयोजित की जाएगी। इस घोषणा का तेलंगाना के मुख्यमंत्री ने स्वागत करते हुए कहा कि यह दक्षिणी राज्यों की एकता और सहयोग को और मजबूत करेगा। गृह मंत्री ने बैठक को सफल बताते हुए कहा कि ऐसी नियमित बैठकें संघीय ढांचे को सशक्त बनाती हैं और राज्यों के बीच विश्वास बढ़ाती हैं। इस बैठक ने दक्षिणी राज्यों की एकजुटता और केंद्र के साथ उनके रचनात्मक संवाद का संदेश दिया है। हालांकि नीट, परिसीमन और कावेरी जैसे जटिल मुद्दों पर तत्काल सहमति नहीं बन सकी, लेकिन बातचीत की प्रक्रिया शुरू होना सकारात्मक संकेत है। भविष्य में इन मुद्दों पर ठोस प्रगति के लिए निरंतर संवाद और राजनीतिक इच्छाशक्ति की आवश्यकता होगी। दक्षिणी राज्य मिलकर देश के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं, बशर्ते उनके हितों का ध्यान रखा जाए।