उच्चतम न्यायालय ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए NEET परीक्षा में कथित अनियमितताओं के विरोध में दिल्ली समेत देशभर में हुए छात्र प्रदर्शनों के दौरान पुलिस द्वारा कथित अत्यधिक बल प्रयोग और हिंसा की घटनाओं की निष्पक्ष जांच के लिए पांच सदस्यीय उच्च स्तरीय जांच समिति का गठन किया है। इस समिति की कमान सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति सुभाष रेड्डी को सौंपी गई है। न्यायालय ने यह कदम छात्रों और अभिभावकों द्वारा दायर उन याचिकाओं पर संज्ञान लेते हुए उठाया है, जिनमें आरोप लगाया गया था कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर पुलिस ने बर्बरतापूर्वक लाठीचार्ज किया, आंसू गैस के गोले दागे और कई छात्रों को गंभीर चोटें आईं। इस फैसले को न्यायपालिका द्वारा नागरिक अधिकारों की रक्षा और कानून प्रवर्तन एजेंसियों की जवाबदेही तय करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है। पृष्ठभूमि में जाएं तो, NEET-UG 2024 के परिणाम घोषित होने के बाद पेपर लीक, ग्रेस मार्क्स देने में अनियमितता और परीक्षा की शुचिता पर उठे सवालों को लेकर लाखों छात्र सड़कों पर उतर आए थे। दिल्ली के जंतर-मंतर और अन्य प्रमुख स्थानों पर हुए इन प्रदर्शनों के दौरान पुलिस और छात्रों के बीच झड़प की कई घटनाएं सामने आईं। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में पुलिसकर्मियों को छात्रों को घसीटते, पीटते और हिरासत में लेते देखा गया, जिससे जनमानस में भारी आक्रोश फैल गया। छात्र संगठनों का आरोप था कि पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को बातचीत का मौका दिए बिना ही दमनात्मक कार्रवाई शुरू कर दी, जबकि पुलिस का तर्क था कि प्रदर्शनकारी उग्र हो गए थे और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचा रहे थे। इन्हीं विरोधाभासी दावों और गंभीर आरोपों के बीच शीर्ष अदालत ने हस्तक्षेप करना उचित समझा। गठित समिति में न्यायमूर्ति सुभाष रेड्डी के अलावा अन्य प्रतिष्ठित सदस्यों को शामिल किया गया है, जिनमें सेवानिवृत्त उच्च न्यायालय के न्यायाधीश, वरिष्ठ पुलिस अधिकारी, प्रशासनिक सेवा के पूर्व अधिकारी और नागरिक समाज के प्रतिनिधि सम्मिलित हैं। समिति को व्यापक अधिकार दिए गए हैं, जिनमें घटनास्थल का दौरा करना, घायल छात्रों और पुलिसकर्मियों के बयान दर्ज करना, CCTV फुटेज और सोशल मीडिया साक्ष्यों की पड़ताल करना तथा संबंधित सरकारी विभागों से रिपोर्ट तलब करना शामिल है। न्यायालय ने समिति को एक निश्चित समयसीमा, संभवतः दो से तीन महीने के भीतर, अपनी विस्तृत रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया है। रिपोर्ट में यह स्पष्ट करना होगा कि क्या पुलिस कार्रवाई आनुपातिक और कानूनी दायरे में थी या फिर अधिकारों का हनन हुआ। इस फैसले पर मिली-जुली प्रतिक्रिया आई है। छात्र संगठनों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने इसका स्वागत करते हुए इसे न्याय की जीत बताया है और उम्मीद जताई है कि दोषी पुलिसकर्मियों पर कड़ी कार्रवाई होगी। वहीं, कुछ पुलिस संघों ने चिंता जताई है कि इससे बल का मनोबल गिर सकता है और कानून व्यवस्था बनाए रखने में मुश्किल आएगी। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह समिति भविष्य में छात्र आंदोलनों और पुलिस व्यवहार के लिए एक नजीर स्थापित करेगी। सरकार की ओर से अभी आधिकारिक प्रतिक्रिया आनी बाकी है, लेकिन सूत्रों के अनुसार केंद्र इस फैसले का अध्ययन कर रहा है और समिति को पूरा सहयोग देने के लिए प्रतिबद्ध है। निष्कर्षतः, सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय लोकतांत्रिक व्यवस्था में विरोध के अधिकार और राज्य की शक्ति के बीच संतुलन कायम करने की दिशा में एक मील का पत्थर साबित हो सकता है। न्यायमूर्ति सुभाष रेड्डी की साख और समिति की स्वतंत्र संरचना से निष्पक्ष जांच की उम्मीद बंधी है। अब सबकी निगाहें समिति की जांच रिपोर्ट पर टिकी हैं, जिससे न केवल पीड़ित छात्रों को न्याय मिलने की राह खुलेगी, बल्कि भविष्य में ऐसे टकरावों को रोकने के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश भी सामने आएंगे। यह कदम पुलिस सुधारों और संवेदनशील परिस्थितियों से निपटने के प्रोटोकॉल को मजबूत करने की दिशा में भी कारगर साबित होगा।