अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के खिलाफ अब तक का सबसे कड़ा आर्थिक अभियान शुरू करने की घोषणा की है। उन्होंने इसे 'आर्थिक डे-डे' नाम दिया है और चेतावनी दी है कि जो भी देश ईरान की सहायता करेगा, उसे 'भयंकर परिणाम' भुगतने पड़ेंगे। ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया मंच पर एक सख्त बयान जारी करते हुए कहा कि यह अब तक का सबसे कुचलने वाला आर्थिक ऑपरेशन होगा, जिसका लक्ष्य ईरान के परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय अस्थिरता फैलाने वाली गतिविधियों को पूरी तरह रोकना है। इस कदम का असर वैश्विक स्तर पर पड़ने की संभावना है, खासकर उन देशों पर जो ईरान से तेल खरीदते हैं या उसके साथ व्यापारिक संबंध रखते हैं। भारत, चीन और कई यूरोपीय देशों के सामने अब मुश्किल चुनौती खड़ी हो गई है। भारत ईरान से कच्चे तेल का बड़ा आयातक रहा है और चाबहार बंदरगाह परियोजना में भी उसकी अहम हिस्सेदारी है। विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप की इस चेतावनी के बाद भारतीय निर्यातकों और ऊर्जा क्षेत्र को झटका लग सकता है, क्योंकि अमेरिकी प्रतिबंधों का उल्लंघन करने वाली कंपनियों पर द्वितीयक प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, ट्रंप प्रशासन ईरान के तेल निर्यात को शून्य तक लाने, उसके बैंकिंग तंत्र को वैश्विक वित्तीय प्रणाली से काटने और रिवोल्यूशनरी गार्ड्स की आर्थिक कमर तोड़ने की योजना पर काम कर रहा है। अल जजीरा और द हिंदू जैसे प्रमुख समाचार संस्थानों ने इस कदम को पश्चिम एशिया की भू-राजनीति में एक बड़े मोड़ के रूप में बताया है। ईरान ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए इसे 'आर्थिक आतंकवाद' करार दिया है और कहा है कि वह किसी भी दबाव के आगे नहीं झुकेगा। जानकारों का कहना है कि यह स्थिति 2018 के उस दौर की याद दिलाती है जब ट्रंप ने ईरान परमाणु समझौते (JCPOA) से अमेरिका को अलग कर दिया था और अधिकतम दबाव की नीति अपनाई थी। हालांकि, इस बार संदर्भ अलग है क्योंकि वैश्विक ऊर्जा बाजार पहले से ही अस्थिर हैं और कई बड़ी अर्थव्यवस्थाएं अमेरिकी एकतरफा प्रतिबंधों का विरोध करती रही हैं। फिर भी, डॉलर-आधारित वैश्विक वित्तीय प्रणाली पर अमेरिका के वर्चस्व के चलते ज्यादातर देश और कंपनियां जोखिम लेने से बचती हैं। अंत में, यह देखना होगा कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय, विशेष रूप से भारत जैसे रणनीतिक साझेदार, इस नई चुनौती से कैसे निपटते हैं। एक तरफ अमेरिकी दबाव है तो दूसरी तरफ ऊर्जा सुरक्षा और क्षेत्रीय संपर्क परियोजनाओं के हित। आने वाले हफ्तों में वित्त मंत्रालय और विदेश मंत्रालय की ओर से स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी होने की उम्मीद है। फिलहाल, वैश्विक बाजार सहमे हुए हैं और कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव देखा जा रहा है।