तेलंगाना के कोंडामल्लेपल्ली में एक दिल दहला देने वाली घटना सामने आई है जहां दसवीं कक्षा के एक छात्र ने अपने विद्यालय के प्रधानाचार्य की चाकू से 27 बार वार करके निर्मम हत्या कर दी। यह वारदात उस समय हुई जब प्रधानाचार्य ने छात्र को पैसों की चोरी करते हुए पकड़ लिया था। पुलिस के अनुसार आरोपी छात्र ने अपने एक साथी के साथ मिलकर प्रधानाचार्य के घर में घुसकर इस जघन्य अपराध को अंजाम दिया। घटना की सूचना मिलते ही पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए दोनों नाबालिग आरोपियों को हिरासत में ले लिया है। पुलिस जांच में पता चला है कि आरोपी छात्रों ने प्रधानाचार्य के घर से लगभग एक लाख इक्यावन हजार रुपये नकद और एक महंगा स्मार्टफोन चुराया था। जब प्रधानाचार्य ने उन्हें चोरी करते हुए रंगे हाथों पकड़ा तो छात्रों ने घबराहट और क्रोध में आकर उन पर चाकू से ताबड़तोड़ वार कर दिए। पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार प्रधानाचार्य के शरीर पर 27 गहरे घाव पाए गए हैं, जिससे स्पष्ट होता है कि हत्या अत्यंत क्रूरता से की गई थी। आरोपियों ने चोरी का सामान छिपाने का भी प्रयास किया था लेकिन पुलिस ने बरामद कर लिया। मामले की तफ्तीश के दौरान पुलिस को अहम सुराग प्रधानाचार्य के मोबाइल फोन की अंतिम कॉल से मिला। मरने से पहले प्रधानाचार्य ने किसी 'बाबू' नामक व्यक्ति से बात की थी, जिसने जांच की दिशा मोड़ दी। कॉल डिटेल और सीसीटीवी फुटेज की मदद से पुलिस ने दोनों छात्रों की पहचान कर उन्हें धर दबोचा। आरोपियों ने अपना गुनाह कबूल कर लिया है और बताया कि वे पैसों की लालच में प्रधानाचार्य के घर गए थे। चोरी पकड़े जाने पर उन्होंने आत्मरक्षा के बजाय हत्या का रास्ता चुना। इस घटना ने पूरे क्षेत्र में सनसनी फैला दी है और शिक्षा जगत को झकझोर कर रख दिया है। अभिभावक और शिक्षक दोनों ही इस बात से स्तब्ध हैं कि इतनी कम उम्र के छात्र ऐसा जघन्य अपराध कैसे कर सकते हैं। मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि यह घटना किशोरों में बढ़ती हिंसक प्रवृत्ति और नैतिक मूल्यों के पतन का द्योतक है। विद्यालय प्रशासन ने मृतक प्रधानाचार्य के परिजनों को हरसंभव सहायता का आश्वासन दिया है। पुलिस ने दोनों नाबालिग आरोपियों को किशोर न्याय बोर्ड के समक्ष पेश किया है जहां आगे की कानूनी कार्रवाई की जाएगी। इस घटना ने समाज के सामने गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं कि आखिर बच्चों में ऐसी हिंसक मानसिकता कहां से पनप रही है। विशेषज्ञों का सुझाव है कि विद्यालयों और घरों में बच्चों की मानसिक स्थिति पर नजर रखने के साथ-साथ उन्हें नैतिक शिक्षा और संवेदनशीलता का पाठ पढ़ाना अत्यंत आवश्यक है। इस दुखद घटना से सबक लेते हुए समूचे शिक्षा तंत्र को आत्ममंथन की आवश्यकता है।