अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के खिलाफ अब तक की सबसे कड़ी कार्रवाई की घोषणा करते हुए इसे 'इकोनॉमिक डी-डे' यानी आर्थिक महाविनाश का दिन करार दिया है। व्हाइट हाउस से जारी बयान में ट्रंप ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि ईरान को 'अभूतपूर्व आर्थिक युद्ध' का सामना करना पड़ेगा, जिसके तहत उस पर अब तक के सबसे कुचल देने वाले प्रतिबंध लगाए जाएंगे। इस घोषणा के साथ ही मध्य पूर्व में तनाव चरम पर पहुंच गया है और अंतरराष्ट्रीय समुदाय इसकी प्रतिक्रिया पर नजरें गड़ाए हुए है। ट्रंप प्रशासन की इस नई रणनीति के तहत न केवल ईरान के तेल निर्यात, बैंकिंग क्षेत्र और शिपिंग उद्योग को निशाना बनाया जाएगा, बल्कि किसी भी देश या कंपनी को चेतावनी दी गई है कि यदि वे ईरान की आर्थिक मदद करेंगे तो उन्हें भी भयंकर आर्थिक परिणाम भुगतने होंगे। पेंटागन प्रमुख ने स्पष्ट किया कि अमेरिकी नौसेना ईरानी बंदरगाहों पर अनिश्चितकाल तक नौसैनिक नाकाबंदी बनाए रख सकती है। अल जजीरा और रॉयटर्स की रिपोर्ट्स के अनुसार, ये प्रतिबंध ईरान की अर्थव्यवस्था को पूरी तरह से पंगु बनाने के उद्देश्य से डिजाइन किए गए हैं। भारत सहित कई प्रमुख देशों के लिए यह स्थिति बेहद संवेदनशील है, क्योंकि ईरान से तेल आयात और चाबहार बंदरगाह परियोजना में निवेश जैसे महत्वपूर्ण हित जुड़े हुए हैं। एनडीटीवी और इंडिया टुडे की खबरों के मुताबिक, ट्रंप प्रशासन ने सहयोगी देशों को भी कोई छूट न देने के संकेत दिए हैं, जिससे वैश्विक कूटनीति में नया संकट खड़ा हो सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की एकतरफा कार्रवाई अंतरराष्ट्रीय कानून और व्यापार नियमों का उल्लंघन कर सकती है। ईरान ने इस घोषणा पर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए इसे 'आर्थिक आतंकवाद' करार दिया है और कहा कि वह किसी भी दबाव के आगे झुकेगा नहीं। ईरानी विदेश मंत्री ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अमेरिका की इस एकतरफा कार्रवाई का विरोध करने की अपील की है। वहीं, यूरोपीय संघ और चीन-रूस जैसे देशों ने भी चिंता व्यक्त करते हुए वार्ता के माध्यम से समाधान निकालने पर जोर दिया है। इस पूरे घटनाक्रम से वैश्विक तेल बाजार में अनिश्चितता बढ़ गई है और कच्चे तेल की कीमतों में उछाल आने की आशंका है। भारत जैसे तेल आयातक देशों के लिए यह दोहरी चुनौती है - एक तरफ ऊर्जा सुरक्षा और दूसरी तरफ अमेरिकी प्रतिबंधों का पालन। आने वाले दिनों में देखना होगा कि कूटनीतिक स्तर पर इस संकट का क्या हल निकलता है, लेकिन फिलहाल मध्य पूर्व की भू-राजनीति एक नए और खतरनाक मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है।