सुप्रीम कोर्ट में शुक्रवार को जंतर मंतर पर सीजेपी और नीट पेपर लीक मामले को लेकर प्रदर्शन कर रहे छात्रों के खिलाफ दिल्ली पुलिस की कथित बर्बर कार्रवाई के मामले पर अहम सुनवाई हुई। इस दौरान न्यायालय ने पुलिस की कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठाते हुए दिल्ली पुलिस से विस्तृत जवाब मांगा है। याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वकीलों ने आरोप लगाया कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर पुलिस ने अत्यधिक बल प्रयोग किया, जिसमें कई छात्र गंभीर रूप से घायल हुए हैं। वहीं, दिल्ली पुलिस ने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए दावा किया है कि प्रदर्शनकारी उग्र हो गए थे और उन्होंने पुलिसकर्मियों पर पथराव किया, जिसमें 240 से अधिक पुलिसकर्मी घायल हुए हैं। सुनवाई के दौरान दिल्ली पुलिस की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल ने न्यायालय को बताया कि जंतर मंतर पर 'संसद चलो' मार्च के दौरान प्रदर्शनकारियों ने बैरिकेड तोड़ने का प्रयास किया और कानून व्यवस्था भंग करने की कोशिश की। पुलिस ने अपने हलफनामे में कहा है कि उन्होंने अधिकतम संयम बरता और केवल स्थिति को नियंत्रित करने के लिए आवश्यक बल का प्रयोग किया। पुलिस ने यह भी स्पष्ट किया कि सादे कपड़ों में तैनात पुलिसकर्मियों को केवल व्यवस्था बनाए रखने और लोगों की सहायता के लिए लगाया गया था, न कि किसी गुप्त अभियान के लिए। पुलिस ने छात्रों के 'अवैध जमावड़ा' होने का दावा करते हुए कहा कि उनके पास प्रदर्शन की अनुमति नहीं थी। दूसरी ओर, याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने पुलिस के दावों को झूठा करार देते हुए अदालत के समक्ष वीडियो साक्ष्य और मेडिकल रिपोर्ट पेश कीं। उन्होंने तर्क दिया कि प्रदर्शनकारी छात्र संवैधानिक अधिकारों के तहत शांतिपूर्ण ढंग से अपनी मांग रख रहे थे, जिनमें नीट परीक्षा में हुई धांधली की निष्पक्ष जांच और दोषियों पर कार्रवाई शामिल थी। वकीलों ने आरोप लगाया कि पुलिस ने लाठीचार्ज, वाटर कैनन और आंसू गैस का अंधाधुंध इस्तेमाल किया, जो मौलिक अधिकारों का घोर उल्लंघन है। उन्होंने अदालत से स्वतंत्र जांच आयोग गठित करने और दोषी पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है। न्यायाधीशों की पीठ ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद दिल्ली पुलिस को घटना के सभी सीसीटीवी फुटेज, बॉडी कैमरा रिकॉर्डिंग और संचार लॉग अगली सुनवाई तक सुरक्षित रखने और पेश करने का निर्देश दिया है। अदालत ने टिप्पणी की कि विरोध प्रदर्शन करना नागरिकों का संवैधानिक अधिकार है, लेकिन यह शांतिपूर्ण होना चाहिए। साथ ही पुलिस को भी कानून के दायरे में रहकर कार्रवाई करनी होगी। न्यायालय ने इस संवेदनशील मामले में संतुलन बनाए रखने पर जोर देते हुए कहा कि घायल छात्रों और पुलिसकर्मियों दोनों को उचित चिकित्सा सुविधा मिलनी चाहिए। इस मामले की अगली सुनवाई अगले सप्ताह निर्धारित की गई है, जिसमें दिल्ली पुलिस को अपना विस्तृत हलफनामा दाखिल करना होगा। यह मामला अब छात्र अधिकारों और पुलिस जवाबदेही के बड़े सवाल के रूप में सामने आया है। सुप्रीम कोर्ट का फैसला न केवल इस विशेष घटना बल्कि भविष्य में शांतिपूर्ण प्रदर्शनों से निपटने के लिए पुलिस दिशानिर्देशों को भी प्रभावित करेगा। देशभर के छात्र संगठन और नागरिक अधिकार कार्यकर्ता इस सुनवाई पर नजर बनाए हुए हैं, क्योंकि इसका असर लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा पर पड़ेगा।