संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान कांग्रेस नेता राहुल गांधी द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर की गई 'गले मिलने' संबंधी टिप्पणी ने राजनीतिक गलियारों में तूफान खड़ा कर दिया है। भाजपा ने इस बयान को बचकाना और अपरिपक्व बताते हुए राहुल गांधी पर जमकर निशाना साधा है। केंद्रीय मंत्रियों और पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने एक स्वर में पूछा है कि आखिर राहुल गांधी कब राजनीतिक परिपक्वता धारण करेंगे। यह विवाद उस समय और गहरा गया जब इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी को लेकर की गई टिप्पणी पर सरकार को आधिकारिक स्पष्टीकरण जारी करना पड़ा। भाजपा के वरिष्ठ नेता और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने राहुल गांधी के उपनाम 'गांधी' का उल्लेख करते हुए कहा कि वे ऐसे बयानों की कल्पना भी नहीं कर सकते जो देश के प्रधानमंत्री की गरिमा को ठेस पहुंचाए। संसद भवन परिसर में मीडिया से बातचीत के दौरान उन्होंने राहुल गांधी की टिप्पणी को संसदीय मर्यादा के विपरीत बताया। वहीं भाजपा प्रवक्ताओं ने सोशल मीडिया और प्रेस कॉन्फ्रेंस के माध्यम से इसे कांग्रेस की हताशा का प्रतीक करार दिया। पार्टी का आरोप है कि विपक्ष के पास मुद्दों का अभाव है, इसलिए वह व्यक्तिगत आक्षेप पर उतर आई है। उधर, इटली की प्रधानमंत्री मेलोनी पर राहुल गांधी की टिप्पणी को लेकर विदेश मंत्रालय को सामने आना पड़ा। सरकार ने स्पष्ट किया कि भारत और इटली के बीच गहरे और मजबूत संबंध हैं और किसी भी विदेशी नेता के बारे में टिप्पणी करते समय मर्यादा का ध्यान रखा जाना चाहिए। द क्विंट की फैक्ट-चेक रिपोर्ट में भी यह सामने आया कि इटली सरकार की ओर से राहुल गांधी के बयान पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया जारी नहीं की गई है। इससे कांग्रेस के उन दावों की हवा निकल गई जिनमें कहा जा रहा था कि इटली ने इस मामले पर कड़ी आपत्ति जताई है। इस पूरे प्रकरण ने एक बार फिर संसदीय शिष्टाचार और राजनीतिक विमर्श के गिरते स्तर को उजागर किया है। जहां एक ओर सत्तापक्ष विपक्ष के नेता की परिपक्वता पर सवाल उठा रहा है, वहीं विपक्ष इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सरकार से सवाल पूछने के अधिकार से जोड़ रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ऐसे व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप से जनता के वास्तविक मुद्दे हाशिये पर चले जाते हैं। आने वाले दिनों में यह विवाद और तूल पकड़ सकता है, क्योंकि दोनों पक्ष अपने-अपने रुख पर अडिग नजर आ रहे हैं। निष्कर्षतः, राहुल गांधी की टिप्पणी ने भाजपा को कांग्रेस पर आक्रामक होने का नया अवसर दे दिया है। सरकार ने विदेशी संबंधों की संवेदनशीलता को रेखांकित करते हुए मर्यादा का पाठ पढ़ाया है। अब देखना होगा कि क्या यह विवाद संसद की कार्यवाही को प्रभावित करेगा या फिर दोनों दल जनहित के मुद्दों पर लौटेंगे। लोकतंत्र में संवाद की गरिमा बनाए रखना सभी दलों का दायित्व है, ताकि जनता का विश्वास बना रहे।