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Breaking News: संसद का मानसून सत्र समाप्त: भारी हंगामे के बीच दोनों सदन अनिश्चितकाल के लिए स्थगित, लोकसभा की उत्पादकता मात्र 16 प्रतिशत
🕒 3 weeks ago

संसद का मानसून सत्र शुक्रवार को भारी गतिरोध और हंगामे के बीच अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया गया। लोकसभा और राज्यसभा दोनों सदनों की कार्यवाही साइन डाई (अनिश्चितकाल) के लिए स्थगित होने के साथ ही इस सत्र का समापन हो गया। इस सत्र की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि लोकसभा की उत्पादकता मात्र 16 प्रतिशत दर्ज की गई, जो संसदीय इतिहास में बेहद कम मानी जाती है। सत्र के दौरान विपक्षी दलों ने छात्र आंदोलनों, एफसीआरए संशोधन विधेयक सहित विभिन्न मुद्दों पर सरकार को घेरने का प्रयास किया, जिसके चलते सदन की कार्यवाही बार-बार बाधित होती रही। सत्र के अंतिम दिनों में स्थिति और भी तनावपूर्ण हो गई जब विपक्ष ने विभिन्न मांगों को लेकर जोरदार प्रदर्शन किया। एफसीआरए (विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम) संशोधन विधेयक को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच गहरा मतभेद देखने को मिला। विपक्ष का आरोप था कि सरकार जल्दबाजी में महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित करा रही है और संसदीय परंपराओं का उल्लंघन कर रही है। वहीं सरकार का तर्क था कि विपक्ष जानबूझकर सदन की कार्यवाही बाधित कर रहा है और जनहित के मुद्दों पर चर्चा से भाग रहा है। राज्यसभा में भी स्थिति बेहतर नहीं रही। उच्च सदन की कार्यवाही भी बार-बार स्थगित होती रही और सभापति को कई बार सदन को स्थगित करना पड़ा। संसदीय कार्य मंत्री प्रह्लाद जोशी ने सत्र के समापन पर कहा कि विपक्ष के असहयोगात्मक रवैये के कारण कई महत्वपूर्ण विधेयक लंबित रह गए। दूसरी ओर, विपक्षी नेताओं ने आरोप लगाया कि सरकार संसद को रबर स्टांप की तरह इस्तेमाल करना चाहती है और विपक्ष की आवाज को दबाने का प्रयास कर रही है। इस सत्र के दौरान छात्र आंदोलनों का मुद्दा भी प्रमुखता से उठा। विभिन्न विश्वविद्यालयों में चल रहे छात्र प्रदर्शनों को लेकर विपक्ष ने सरकार पर युवाओं की आवाज दबाने का आरोप लगाया। इस मुद्दे पर दोनों सदनों में तीखी नोकझोंक हुई और कई बार कार्यवाही बाधित हुई। संसदीय विशेषज्ञों का मानना है कि इस सत्र में संसदीय मर्यादा का जो ह्रास हुआ है, वह चिंता का विषय है। निष्कर्षतः, मानसून सत्र का यह समापन भारतीय संसदीय लोकतंत्र के लिए एक चिंताजनक संकेत है। मात्र 16 प्रतिशत उत्पादकता के साथ सत्र का समाप्त होना दर्शाता है कि सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच संवाद और सहमति की भारी कमी है। भविष्य में संसद की गरिमा और प्रभावशीलता बनाए रखने के लिए दोनों पक्षों को गतिरोध दूर करने और रचनात्मक विमर्श की परंपरा विकसित करने की आवश्यकता है।

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✍️ By Pradeep Yadav | 13 Aug 2026