झारखंड की राजधानी रांची में सरकारी नौकरियों की मांग को लेकर युवाओं का शांतिपूर्ण प्रदर्शन मंगलवार को उस समय हिंसक हो गया जब पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करने के लिए आंसू गैस के गोले दागे और लाठीचार्ज किया। हजारों की संख्या में जुटे छात्र और बेरोजगार युवा पांच किलोमीटर लंबे मार्च के लिए निकले थे, लेकिन प्रशासन ने छह स्तरीय बैरिकेडिंग लगाकर उनका रास्ता रोक दिया। हालात बिगड़ने पर पुलिस को बल प्रयोग करना पड़ा, जिसमें कई प्रदर्शनकारी घायल हो गए। इस घटना ने राज्य की राजनीति को गरमा दिया है और विपक्षी दलों ने सरकार पर युवाओं की आवाज दबाने का आरोप लगाया है। प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे देवेंद्र नाथ महतो को सिटीजन फॉर जस्टिस एंड पीस (सीजेपी) ने सराहा है, जबकि भाजपा ने कांग्रेस पर दोहरा रवैया अपनाने का आरोप लगाया है। भाजपा का कहना है कि कांग्रेस एक तरफ छात्रों का समर्थन कर रही है तो दूसरी तरफ सरकार में भी बनी हुई है। सांसद परिमल नथवानी ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से आग्रह किया है कि वे छात्रों की मांगों को बातचीत के जरिए सुलझाएं। उन्होंने लाठीचार्ज की निंदा करते हुए कहा कि युवाओं की जायज मांगों को सुनना सरकार का कर्तव्य है। द क्विंट की रिपोर्ट के अनुसार, पांच किलोमीटर के मार्च के लिए प्रशासन ने छह लेयर की बैरिकेडिंग की थी, जिससे साफ जाहिर होता है कि सरकार प्रदर्शन को लेकर कितनी आशंकित थी। प्रदर्शनकारी झारखंड लोक सेवा आयोग (जेपीएससी) और झारखंड कर्मचारी चयन आयोग (जेएसएससी) की परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं की जांच और रिक्त पदों पर भर्ती की मांग कर रहे हैं। युवाओं का आरोप है कि वर्षों से परीक्षाएं लटकी हुई हैं और भर्ती प्रक्रिया भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गई है। द प्रिंट के अनुसार, कांग्रेस इस मुद्दे पर असमंजस की स्थिति में है। पार्टी छात्रों के साथ खड़े होने का दावा करती है, लेकिन झारखंड मुक्ति मोर्चा के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार का हिस्सा भी है। इस दोहरी भूमिका ने कांग्रेस को राजनीतिक रूप से कमजोर कर दिया है। भाजपा इस मौके का फायदा उठाते हुए युवाओं का मसीहा बनने की कोशिश कर रही है, जबकि वह खुद केंद्र में रोजगार के मोर्चे पर विफल रही है। इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर बेरोजगारी के गंभीर संकट को उजागर कर दिया है। झारखंड जैसे संसाधन संपन्न राज्य में युवाओं का सड़कों पर उतरना व्यवस्था की विफलता का प्रतीक है। सरकार को बल प्रयोग के बजाय संवाद का रास्ता अपनाना चाहिए और रिक्त पदों को पारदर्शी तरीके से भरने की समयबद्ध योजना पेश करनी चाहिए। युवाओं का आक्रोश जायज है और इसे दबाने से समस्या और विकराल होगी। लोकतंत्र में विरोध की आवाज को सम्मान देना ही असली राजधर्म है।