केंद्र सरकार ने विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, जिसे एफसीआरए संशोधन विधेयक के नाम से जाना जाता है, पर जारी गतिरोध को समाप्त करने की दिशा में बड़ा निर्णय लिया है। विपक्षी दलों की ओर से विधेयक को पूरी तरह वापस लेने की मांग और पूर्वोत्तर के राज्यों मिजोरम तथा नगालैंड में हो रहे व्यापक विरोध-प्रदर्शनों को देखते हुए सरकार ने इस विवादास्पद विधेयक को संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के पास भेजने पर सहमति बनाने का प्रयास तेज कर दिया है। सूत्रों के अनुसार, संसदीय कार्य मंत्री प्रह्लाद जोशी ने विभिन्न दलों के नेताओं के साथ बैठक कर इस प्रस्ताव पर आम राय कायम करने की कवायद शुरू की है, ताकि संसद के चालू सत्र में विधायी कार्य सुचारू रूप से चल सके। विपक्षी दल, जिनमें कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, द्रमुक और वाम दल प्रमुख हैं, लगातार यह आरोप लगा रहे हैं कि प्रस्तावित संशोधन गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) और नागरिक समाज की आवाज को दबाने वाला है। उनका तर्क है कि नए प्रावधानों से विदेशी अनुदान प्राप्त करने की प्रक्रिया इतनी जटिल और प्रतिबंधात्मक बना दी गई है कि सामाजिक कार्यों में लगे छोटे संगठनों का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा। विपक्ष का कहना है कि सरकार बिना व्यापक चर्चा के इस विधेयक को पारित कराना चाहती है, इसलिए इसे तत्काल वापस लिया जाए या फिर गहन समीक्षा के लिए जेपीसी को सौंपा जाए। सरकार का जेपीसी भेजने का प्रस्ताव इसी दबाव का नतीजा माना जा रहा है। पूर्वोत्तर के राज्यों में इस विधेयक का विरोध अलग ही स्वरूप ले चुका है। मिजोरम में गैर-सरकारी संगठनों और चर्च आधारित संस्थाओं ने बड़े पैमाने पर प्रदर्शन किए हैं, वहीं नगालैंड के मुख्यमंत्री नेफ्यू रियो ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को पत्र लिखकर विधेयक पर पुनर्विचार करने और इसे संसदीय समिति को भेजने का आग्रह किया है। इन राज्यों का तर्क है कि विदेशी अनुदान यहां शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक कल्याण की रीढ़ है। नए कानून से ग्रामीण इलाकों में चल रहे अस्पतालों, स्कूलों और अनाथालयों के संचालन पर सीधा असर पड़ेगा, जिससे जनजातीय समुदायों का विकास बाधित होगा। सरकार का पक्ष है कि एफसीआरए में संशोधन विदेशी धन के दुरुपयोग को रोकने और राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करने के लिए आवश्यक है। सरकार का दावा है कि कुछ संगठन विदेशी धन का उपयोग धर्मांतरण, राष्ट्रविरोधी गतिविधियों और आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप के लिए कर रहे थे, जिस पर अंकुश लगाना अनिवार्य हो गया था। हालांकि, जेपीसी को भेजने पर सहमति बनाकर सरकार ने यह संकेत दिया है कि वह विपक्ष और प्रभावित हितधारकों की चिंताओं को नजरअंदाज नहीं करना चाहती। जेपीसी में सभी दलों के सांसद शामिल होते हैं, जो विधेयक के हर पहलू की बारीकी से जांच कर अपनी सिफारिशें देंगे। अब सभी की निगाहें संसद के आगामी घटनाक्रम पर टिकी हैं। यदि जेपीसी को भेजने पर अंतिम मुहर लगती है तो यह सरकार के लचीले रुख और लोकतांत्रिक प्रक्रिया के प्रति सम्मान को दर्शाएगा। समिति की रिपोर्ट आने तक विधेयक पर रोक लगी रहेगी, जिससे पूर्वोत्तर के राज्यों और नागरिक समाज को राहत मिलेगी। यह प्रकरण दर्शाता है कि सशक्त विपक्ष और क्षेत्रीय दबाव सरकार को संवाद और सहमति के रास्ते पर चलने के लिए विवश कर सकते हैं। अंततः जेपीसी की संस्तुतियां ही तय करेंगी कि विदेशी अनुदान का नियमन पारदर्शिता और विकास के बीच संतुलन साध पाता है या नहीं।