विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (एफसीआरए) में प्रस्तावित संशोधनों पर केंद्र सरकार ने फिलहाल ब्रेक लगा दी है। सूत्रों के अनुसार, इस विधेयक को ठंडे बस्ते में डालने के पीछे राजनीतिक गणित काम कर रहा है। आगामी परिसीमन प्रक्रिया को देखते हुए सरकार तमिलनाडु की सत्तारूढ़ DMK और महाराष्ट्र में शरद पवार के नेतृत्व वाली NCP (SP) को साधने की कोशिश में है। दोनों दल एफसीआरए संशोधनों का कड़ा विरोध कर रहे हैं, और सरकार नहीं चाहती कि परिसीमन जैसे संवेदनशील मुद्दे पर इनका समर्थन खोए। विपक्षी दलों के अलावा इस विधेयक का विरोध ईसाई संगठनों और मिजोरम के मुख्यमंत्री ने भी किया है। उन्होंने गृह मंत्री से अपील की है कि इस विधेयक को वापस लिया जाए। इन संगठनों का तर्क है कि प्रस्तावित संशोधन गैर-सरकारी संगठनों, शैक्षणिक संस्थानों और धार्मिक संस्थाओं के विदेशी अनुदान प्राप्त करने की राह में अनावश्यक बाधाएं खड़ी करेंगे। सामाजिक क्षेत्र में काम करने वाले संगठनों को डर है कि नए प्रावधानों से उनका कामकाज प्रभावित होगा और पारदर्शिता के नाम पर उत्पीड़न बढ़ेगा। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इस विधेयक को लेकर चिंता जताई गई है। अमेरिकी सांसदों द्वारा सवाल उठाए जाने के बाद भारतीय राजदूत को सफाई देनी पड़ी। उन्होंने 'रियलिटी चेक' देते हुए कहा कि भारत में विदेशी फंडिंग के नियम पहले से ही सख्त हैं और नया विधेयक केवल शासन व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए है। NDTV की एक रिपोर्ट में भी सरकार का पक्ष रखते हुए इसे 'बेहतर प्रशासन और स्पष्ट नियम' की दिशा में कदम बताया गया। हालांकि, आलोचक इसे नागरिक समाज की आवाज दबाने का हथियार मानते हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सरकार का यह कदम चुनावी रणनीति का हिस्सा है। परिसीमन आयोग के गठन और उसकी सिफारिशों को लागू कराने के लिए संसद में व्यापक सहमति चाहिए। DMK और NCP (SP) जैसे क्षेत्रीय दलों का समर्थन इस प्रक्रिया को सुगम बना सकता है। इसलिए सरकार ने विवादित विधेयक को फिलहाल टालकर राजनीतिक सद्भावना अर्जित करने का रास्ता चुना है। निष्कर्षतः, एफसीआरए संशोधन विधेयक पर सरकार का रुख नरम पड़ना शुद्ध रूप से राजनीतिक निर्णय प्रतीत होता है। जहां एक ओर इससे विपक्षी दलों और नागरिक समाज को राहत मिली है, वहीं यह सवाल भी खड़ा होता है कि क्या शासन सुधार के नाम पर लाए जाने वाले कानून राजनीतिक सुविधा के अनुसार आगे बढ़ाए या रोके जाते हैं। आने वाले दिनों में परिसीमन की प्रक्रिया और उसमें इन दलों की भूमिका तय करेगी कि यह रणनीतिक विराम कितना कारगर साबित होता है।