झारखंड सरकार ने लंबे समय से चल रहे छात्र आंदोलन के दबाव में आकर झारखंड लोक सेवा आयोग (जेपीएससी) द्वारा आयोजित तीन विवादित परीक्षाओं को रद्द करने का बड़ा फैसला लिया है। इस निर्णय के तुरंत बाद आयोग के तीनों सदस्यों ने अपने पदों से इस्तीफा दे दिया, जिससे राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था में हलचल मच गई है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की अध्यक्षता में हुई उच्च स्तरीय बैठक के बाद इस आशय की घोषणा की गई, जिसे सरकार ने छात्रों की 98 प्रतिशत मांगें मानने का दावा किया है। रद्द की गई परीक्षाओं में सहायक अभियंता, नगरपालिका सेवा और झारखंड शिक्षा सेवा की प्रतियोगी परीक्षाएं शामिल हैं। इन परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं, पेपर लीक और परिणामों में गड़बड़ी के आरोप लगाते हुए राज्यभर के अभ्यर्थी पिछले कई हफ्तों से राजधानी रांची समेत विभिन्न जिलों में धरना-प्रदर्शन कर रहे थे। छात्र संगठनों की मांग थी कि सभी 13 विवादित परीक्षाओं को रद्द किया जाए और पूरे प्रकरण की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) से कराई जाए। हालांकि सरकार ने फिलहाल केवल तीन परीक्षाओं को ही रद्द करने की सहमति जताई है। सरकार के इस फैसले को छात्र संगठनों ने अपर्याप्त बताते हुए खारिज कर दिया है। आंदोलनरत छात्रों का कहना है कि जब तक शेष 10 परीक्षाओं को भी रद्द नहीं किया जाता और दोषी अधिकारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई नहीं होती, तब तक उनका आंदोलन जारी रहेगा। छात्र नेताओं ने सरकार के '98 प्रतिशत मांगें पूरी' के दावे को भ्रामक बताते हुए कहा कि उनकी मूल मांग सीबीआई जांच और सभी विवादित परीक्षाओं की रद्दीकरण पर अडिग है। आदिवासी युवाओं के लिए ये परीक्षाएं सिर्फ नौकरी का जरिया नहीं, बल्कि व्यवस्था में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करने का एकमात्र रास्ता हैं। उधर, जेपीएससी के तीनों सदस्यों के सामूहिक इस्तीफे ने आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह घटनाक्रम राज्य की भर्ती प्रणाली में व्याप्त भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद की पोल खोलता है। सरकार ने नए सदस्यों की नियुक्ति और आयोग के पुनर्गठन की प्रक्रिया शुरू करने का आश्वासन दिया है, लेकिन विपक्षी दल इस पूरे प्रकरण को सरकार की विफलता बता रहे हैं। मुख्यमंत्री ने छात्रों से आंदोलन वापस लेने की अपील करते हुए कहा कि सरकार उनकी हर जायज मांग पर गंभीरता से विचार कर रही है। इस पूरे घटनाक्रम ने झारखंड की प्रतियोगी परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता पर गहरा आघात किया है। जहां एक ओर सरकार अपने फैसले को ऐतिहासिक बता रही है, वहीं छात्रों का विश्वास जीतने के लिए अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। भविष्य में ऐसी स्थितियों से बचने के लिए पारदर्शी, निष्पक्ष और समयबद्ध भर्ती प्रक्रिया की स्थापना अनिवार्य हो गई है। देखना होगा कि आने वाले दिनों में सरकार छात्रों की शेष मांगों पर क्या रुख अपनाती है और जेपीएससी का नया स्वरूप कैसा होता है।