तमिलनाडु में लोकसभा सीटों के परिसीमन को लेकर छिड़े सियासी घमासान के बीच अभिनेता से राजनेता बने विजय की अध्यक्षता में बुलाई गई सर्वदलीय बैठक को उस समय तगड़ा झटका लगा जब राज्य के 57 में से 37 सांसदों ने इसमें भाग लेने से इनकार कर दिया। बैठक में केवल 21 सांसद ही उपस्थित हुए, जबकि सत्तारूढ़ द्रविड़ मुनेत्र कषगम (द्रमुक) और प्रमुख विपक्षी दल अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कषगम (अन्नाद्रमुक) ने इस पूरी कवायद को 'दिखावा' करार देते हुए इससे किनारा कर लिया। द्रमुक ने तो बाकायदा बयान जारी कर इस बैठक को 'नौटंकी' बताया और कहा कि परिसीमन के मुद्दे पर मुख्यमंत्री एमके स्टालिन के नेतृत्व में पहले से ही सर्वसम्मति बनाने की प्रक्रिया चल रही है। बैठक में उपस्थित नेताओं ने केंद्र सरकार के प्रस्तावित परिसीमन विधेयक को तमिलनाडु के हितों के खिलाफ बताते हुए इसे खारिज करने का प्रस्ताव पारित किया। वक्ताओं ने कहा कि जनसंख्या नियंत्रण में सफल रहे दक्षिणी राज्यों को परिसीमन के नाम पर दंडित नहीं किया जाना चाहिए। हालांकि, दोनों प्रमुख क्षेत्रीय दलों की गैरमौजूदगी ने इस प्रस्ताव की विश्वसनीयता पर सवालिया निशान लगा दिया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विजय की नवगठित पार्टी 'तमिलगा वेट्री कषगम' अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने के लिए इस मुद्दे को भुनाने का प्रयास कर रही है, लेकिन स्थापित दलों की अनुपस्थिति ने इस प्रयास को कमजोर कर दिया है। द्रमुक और अन्नाद्रमुक के रुख से स्पष्ट है कि तमिलनाडु की राजनीति में परिसीमन का मुद्दा अभी भी गहरे मतभेदों का शिकार है। जहां द्रमुक इसे संवैधानिक ढांचे के भीतर मुख्यमंत्री स्टालिन के नेतृत्व में लड़ना चाहती है, वहीं विजय इसे एक व्यापक जनआंदोलन का रूप देना चाहते हैं। बैठक के बाद जारी संयुक्त बयान में उपस्थित नेताओं ने 'एकजुट मोर्चा' बनाने की बात कही, लेकिन जमीन पर यह एकता कितनी टिकाऊ होगी, यह देखने वाली बात होगी। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के उस बयान के बाद जिसमें उन्होंने आश्वासन दिया था कि परिसीमन में तमिलनाडु का हिस्सा कम नहीं होगा, के बावजूद राज्य में आशंकाएं बरकरार हैं। निष्कर्षतः, तमिलनाडु में परिसीमन का मुद्दा अब कानूनी-राजनीतिक लड़ाई से आगे बढ़कर दलीय प्रतिष्ठा की जंग बन चुका है। विजय की बैठक भले ही एक राजनीतिक संदेश देने में सफल रही हो, लेकिन प्रमुख दलों की अनुपस्थिति ने यह साबित कर दिया कि राज्य की जनता के सामने एकजुटता का दिखावा करना आसान नहीं है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या यह मुद्दा तमिलनाडु की राजनीति में नए समीकरण गढ़ेगा या फिर मौजूदा दलीय खेमेबंदी ही मजबूत होगी। फिलहाल, परिसीमन की आंच में तप रही तमिल राजनीति का ऊंट किस करवट बैठेगा, यह भविष्य के गर्भ में है।